लिखित बयान में जालसाजी की दलील नहीं तो गवाही के चरण में हस्तलेख विशेषज्ञ की रिपोर्ट पेश नहीं कर सकते: राजस्थान हाईकोर्ट
Amir Ahmad
26 Sept 2026 12:11 PM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी पक्ष ने अपने लिखित बयान में दस्तावेज पर हस्ताक्षर जाली या कूटरचित होने की दलील नहीं दी तो वह गवाही के चरण में हस्तलेख विशेषज्ञ की रिपोर्ट पेश कर उस नई दलील को स्थापित नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा कि साक्ष्य के जरिए ऐसा नया तथ्य या बचाव पेश नहीं किया जा सकता, जिसकी बुनियाद ही मूल दलीलों में मौजूद नहीं थी।
जस्टिस फरजंद अली की पीठ ने कहा कि दलीलें ही साक्ष्य की बुनियाद होती हैं और दूसरे पक्ष को यह पता होना चाहिए कि उसे किस मामले का सामना करना है। गवाही के जरिए पहली बार कोई नया तथ्य पेश करने की अनुमति देने से दूसरे पक्ष को नुकसान होगा।
कोर्ट ने कहा,
“पहले से रखी गई दलील को विस्तार देने और पूरी तरह नई दलील पेश करने के बीच के अंतर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। साक्ष्य का उद्देश्य दलीलों को साबित करना है; उसका इस्तेमाल उन दलीलों की बुनियाद ही तैयार करने के लिए नहीं किया जा सकता, जो मूल दलीलों में मौजूद नहीं हैं।”
मामला उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका से जुड़ा था, जिसमें निचली अदालत ने गवाही के चरण में दस्तावेज रिकॉर्ड पर लेने से इनकार किया। अदालत ने माना कि प्रस्तावित दस्तावेज मूल दलीलों के दायरे से बाहर है।
प्रतिवादी ने अनुबंध के विशिष्ट पालन के लिए याचिकाकर्ता के खिलाफ मुकदमा दायर किया। मामले में गवाही के चरण में याचिकाकर्ता ने हस्तलेख विशेषज्ञ का शपथपत्र रिकॉर्ड पर लेने की मांग की। निचली अदालत ने इससे इनकार कर दिया, जिसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई।
हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के लिखित बयान में कहीं भी यह विशेष दलील नहीं दी गई कि संबंधित अनुबंध पर किए गए हस्ताक्षर जाली या कूटरचित हैं। न ही हस्ताक्षरों की वास्तविकता की जांच के लिए किसी विशेषज्ञ की राय लेने की कोई दलील दी गई।
पीठ ने कहा,
“किसी पक्ष को सामान्यतः अपनी दलीलों की सीमाओं के भीतर ही अपना मामला साबित करना होता है। दलीलें वह आधार हैं, जिस पर साक्ष्य की पूरी संरचना खड़ी होती है। किसी पक्ष को बाद के चरण में अपने मूल मामले से आगे जाकर ऐसी नई तथ्यात्मक बुनियाद या बचाव पेश करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जो मूल दलीलों में स्पष्ट रूप से मौजूद ही नहीं था।”
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की कोशिश को पहले से मौजूद दलील का महज विस्तार नहीं माना जा सकता। लिखित बयान में मौजूद कमी को गवाही के चरण में पेश की गई विशेषज्ञ रिपोर्ट के जरिए पूरा करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
इसके आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की और निचली अदालत का वह आदेश बरकरार रखा, जिसमें हस्तलेख विशेषज्ञ का शपथपत्र रिकॉर्ड पर लेने से इनकार किया गया।

