NI कोर्ट और कमर्शियल कोर्टकी कार्यवाही समान स्तर पर बचाव के लिए मूल दस्तावेज पाने का आरोपी को अधिकार: राजस्थान हाईकोर्ट

Amir Ahmad

20 July 2026 4:53 PM IST

  • NI कोर्ट और कमर्शियल कोर्टकी कार्यवाही समान स्तर पर बचाव के लिए मूल दस्तावेज पाने का आरोपी को अधिकार: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि परक्राम्य लिखत अधिनियम (NI Act) के तहत गठित अदालत और कॉमर्शियल कोर्ट की कार्यवाही समान स्तर पर होती है। केवल इस आधार पर कि मूल दस्तावेज किसी अन्य अदालत ने तलब कर रखे हैं, आरोपी को अपने बचाव के लिए उन दस्तावेजों तक पहुंच से वंचित नहीं किया जा सकता।

    जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू की सिंगल बेंच ने कहा कि निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार में प्रभावी जिरह और बचाव के लिए आवश्यक मूल अभिलेखों तक पहुंच भी शामिल है। अदालत ने ट्रायल कोर्ट का वह आदेश रद्द कर दिया, जिसमें मूल रिकॉर्ड तलब करने की आरोपी की अर्जी खारिज कर दी गई।

    कोर्ट ने कहा,

    "जब मूल रिकॉर्ड उपलब्ध है और विवाद चेक तथा उसकी काउंटर फॉयल में कथित हेरफेर से जुड़ा है, तब शिकायतकर्ता से क्रॉस एग्जामिनेशन के दौरान मूल चेक दिखाना आवश्यक है। केवल फोटोप्रति या प्रमाणित प्रति से यह उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। अपने बचाव का पूरा अवसर प्राप्त करना याचिकाकर्ता का अधिकार है।"

    मामले में प्रतिवादी ने याचिकाकर्ता के खिलाफ NI Act की धारा 138 के तहत शिकायत दायर की थी, जो NI कोर्ट में लंबित है। दूसरी ओर, याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि संबंधित चेक का दुरुपयोग किया गया और उसमें हेरफेर की गई। इस संबंध में उसने FIR दर्ज कराई, जिसके आधार पर आपराधिक मामला भी विचाराधीन है।

    जांच के दौरान पुलिस ने कई मूल दस्तावेज जब्त किए, जिनमें शिकायतकर्ता की लिखावट वाली चेकबुक की काउंटर फॉयल और फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL) की मूल रिपोर्ट भी शामिल थी। बाद में हाईकोर्ट के आदेश पर ये अभिलेख कॉमर्शियल कोर्ट में तलब कर लिए गए।

    याचिकाकर्ता ने NI कोर्ट में आवेदन देकर कहा कि शिकायतकर्ता से प्रभावी क्रॉस एग्जामिनेशन करने और अपना बचाव साबित करने के लिए मूल दस्तावेज आवश्यक हैं। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि मूल रिकॉर्ड मंगाने से कॉमर्शियल कोर्ट की कार्यवाही प्रभावित होगी और प्रमाणित प्रतियां पर्याप्त हैं।

    हाईकोर्ट ने इस दृष्टिकोण को गलत ठहराते हुए कहा कि यदि चेक में कथित हेरफेर का मुद्दा समानांतर आपराधिक कार्यवाही में उठाया गया है तो आरोपी को मूल दस्तावेज तलब कराने का पूरा अधिकार है।

    अदालत ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 94 अदालतों को जांच या विचारण के लिए आवश्यक दस्तावेज तलब करने का व्यापक अधिकार देती है। यदि कोई दस्तावेज न्यायपूर्ण और निष्पक्ष निर्णय के लिए आवश्यक या वांछनीय है, तो उसे रिकॉर्ड पर लाया जाना चाहिए।

    कोर्ट ने पाया कि विवादित चेक ही पूरे मामले का आधार है और उसमें कथित हेरफेर का आरोप मामले की जड़ से जुड़ा हुआ है। इसलिए दोनों मामलों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।

    इन्हीं कारणों से हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए निर्देश दिया कि अगली सुनवाई पर मूल रिकॉर्ड कॉमर्शियल कोर्ट से NI कोर्ट भेजे जाएं। साथ ही यह भी कहा कि यदि दोनों मामलों की सुनवाई की तारीखें एक ही दिन पड़ती हैं, तो संबंधित अदालतें आपसी समन्वय से तारीखों में आवश्यक बदलाव करें। याचिका इसी आधार पर स्वीकार कर ली गई।

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