तलाक के बाद अलग रहने से वैवाहिक अपराध का मामला खत्म नहीं हो सकता: राजस्थान हाईकोर्ट

Amir Ahmad

19 Aug 2026 4:46 PM IST

  • तलाक के बाद अलग रहने से वैवाहिक अपराध का मामला खत्म नहीं हो सकता: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर वैवाहिक अपराध से जुड़े आपराधिक मामले को खत्म नहीं किया जा सकता कि पति-पत्नी का तलाक हो चुका है और दोनों अब अलग-अलग रह रहे हैं। अदालत ने कहा कि वैवाहिक विवाद में यदि अपराध के आरोप लगाए गए हैं तो उनका समाधान कानून के तहत ही होना चाहिए।

    जस्टिस अशोक कुमार जैन की पीठ ने पति की ओर से दायर वह याचिका खारिज की, जिसमें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498ए के तहत दर्ज FIR और उसके आधार पर चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की गई।

    मामले में पति-पत्नी की शादी वर्ष 2014 में हुई। नवंबर 2018 में पति ने तलाक के लिए याचिका दायर की, जिसके बाद तलाक की डिक्री पारित हो गई। इसके बाद दिसंबर 2018 में पत्नी ने पति के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज कराई। इसी शिकायत के आधार पर धारा 498ए के तहत FIR दर्ज की गई।

    पति की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि FIR में लगाए गए आरोप अस्पष्ट हैं। दोनों पक्ष अब अलग-अलग रह रहे हैं और पत्नी स्वयं भी नौकरी कर रही है। ऐसे में तलाक के बाद आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

    हाईकोर्ट ने माना कि यदि FIR में आरोप पूरी तरह अस्पष्ट हों और किसी विशेष आपराधिक कृत्य का कोई उल्लेख न हो तो ऐसी स्थिति में आपराधिक कार्यवाही जारी रखने का कोई औचित्य नहीं होता। हालांकि, अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री की जांच करने के बाद पाया कि इस मामले की FIR में दहेज की मांग और क्रूरता समेत कई विशिष्ट आरोप लगाए गए।

    पीठ ने कहा कि ऐसे आरोपों की सच्चाई या झूठ का फैसला मुकदमे के दौरान साक्ष्यों के आधार पर किया जाना है। इन्हें FIR रद्द करने के स्तर पर जांचकर मामले को खत्म नहीं किया जा सकता।

    अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा,

    “केवल इस आधार पर आपराधिक मामला रद्द नहीं किया जा सकता कि पति या पत्नी में से किसी एक ने तलाक की डिक्री प्राप्त कर ली है और अब दोनों अलग रह रहे हैं।”

    हाईकोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी के बीच मतभेद होना और उनका अलग रहना संभव है लेकिन यदि वैवाहिक अपराध के आरोप सामने आए हैं तो उनके निपटारे के लिए कानून में निर्धारित प्रक्रिया अपनानी होगी।

    चूंकि FIR में दहेज की मांग और क्रूरता से संबंधित आरोप मौजूद थे और उनकी जांच मुकदमे के दौरान होनी थी इसलिए हाईकोर्ट ने आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार करते हुए याचिका खारिज की।

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