20 साल सेवा के बाद अवैध रूप से हटाई गई शिक्षिका को सिर्फ 1 लाख मुआवजा देना अनुचित: राजस्थान हाईकोर्ट ने बढ़ाकर 20 लाख किया
Amir Ahmad
21 Aug 2026 2:18 PM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने अवैध रूप से सेवा से हटाई गई शिक्षिका को दिए गए एक लाख रुपये के मुआवजे को बढ़ाकर 20 लाख रुपये किया।
अदालत ने कहा कि राजस्थान गैर-सरकारी शैक्षणिक संस्थान अधिकरण द्वारा दिया गया एक लाख रुपये का मुआवजा बेहद असंगत था।
जस्टिस अनुरूप सिंघी की पीठ एक हिंदी शिक्षिका की याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिन्होंने संबंधित स्कूल में करीब 20 वर्ष तक सेवा की थी। वर्ष 2015 में स्कूल ने यह कहते हुए उनकी सेवाएं समाप्त कर दी थीं कि हिंदी विषय पढ़ने के लिए कोई छात्र उपलब्ध नहीं है।
शिक्षिका ने सेवा समाप्ति को राजस्थान गैर-सरकारी शैक्षणिक संस्थान अधिकरण के समक्ष चुनौती दी थी। अधिकरण ने उनकी सेवा समाप्ति को कानूनन गलत माना, लेकिन तब तक शिक्षिका रिटायरमेंट की आयु प्राप्त कर चुकी थीं। इसलिए उन्हें दोबारा सेवा में बहाल करने के बजाय एक लाख रुपये का एकमुश्त मुआवजा दिया गया।
शिक्षिका ने मुआवजे की राशि को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का रुख किया। उनकी ओर से कहा गया कि यदि सेवा समाप्त नहीं की जाती तो उन्हें जो वेतन और अन्य सेवा लाभ मिलते, उनके अनुरूप उचित मुआवजा दिया जाना चाहिए था।
यह भी दलील दी गई कि केवल एक लाख रुपये का भुगतान करने से स्कूल को अपने गलत कृत्य का लाभ मिल जाएगा।
हाईकोर्ट ने पाया कि शिक्षिका स्थायी कर्मचारी थीं और उन्होंने करीब 20 वर्ष तक बिना किसी दाग के सेवा की थी। उन्हें किसी कदाचार के कारण सेवा से नहीं हटाया गया। सेवा समाप्ति से लेकर रिटायरमेंट तक की अवधि में वह किसी अन्य रोजगार में भी नहीं थीं।
अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि शिक्षिका की सेवा समाप्ति को अधिकरण पहले ही कानून के विपरीत ठहरा चुका था और स्कूल ने उस निष्कर्ष को चुनौती नहीं दी थी। इसलिए सेवा समाप्ति के अवैध होने का निष्कर्ष अंतिम हो चुका था।
जस्टिस अनूप सिंघी ने कहा कि सेवा समाप्ति से रिटायरमेंट तक शिक्षिका को मिलने वाले न्यूनतम वेतन के आधार पर भी एक लाख रुपये का मुआवजा उचित नहीं था।
अदालत ने कहा,
“अधिकरण द्वारा दिया गया एक लाख रुपये का मुआवजा बेहद असंगत है।”
रिकॉर्ड के अनुसार शिक्षिका का मासिक वेतन करीब 50 हजार रुपये था और सेवा समाप्ति से उनकी रिटायमेंट तक 67 महीने से अधिक का अंतर था। इस आधार पर उनके न्यूनतम वेतन की राशि करीब 33.50 लाख रुपये बैठती थी।
हालांकि हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इस गणना के आधार पर 33.50 लाख रुपये का मुआवजा देना जरूरी नहीं है। मुआवजा तय करते समय मामले की अन्य परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना होगा।
अदालत ने कहा कि किसी पक्ष को अपनी गलती का लाभ उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अधिकरण को यह भी देखना चाहिए था कि शिक्षिका को ऐसा मुआवजा मिले, जो केवल आर्थिक नुकसान की भरपाई ही न करे बल्कि उस सम्मान और गरिमा को भी ध्यान में रखे, जो उन्हें पूरी अवधि तक सेवा करने पर मिलती।
हाईकोर्ट ने कहा कि मुआवजे की राशि इतनी कम नहीं होनी चाहिए कि अवैध सेवा समाप्ति करने वाला पक्ष अपने गलत कृत्य से लाभ की स्थिति में आ जाए और कर्मचारी को गंभीर नुकसान उठाना पड़े।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा अलग-अलग मामलों में निर्धारित सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने शिक्षिका के मुआवजे को एक लाख रुपये से बढ़ाकर 20 लाख रुपये किया।
अदालत ने संबंधित स्कूल को निर्देश दिया कि वह आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तारीख से दो महीने के भीतर 20 लाख रुपये का एकमुश्त भुगतान शिक्षिका को करे। इसी के साथ याचिका का निपटारा कर दिया गया।


