63 साल पुराने राजस्व मामले पर राजस्थान हाईकोर्ट सख्त, 3 महीने में निपटाने का आदेश
Amir Ahmad
26 Sept 2026 12:41 PM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने 63 साल पुराने राजस्व मामले को तीन महीने के भीतर निपटाने का आदेश दिया। जस्टिस अनूप कुमार धांड की पीठ ने निर्देश दिया कि मामले में अनावश्यक स्थगन नहीं दिया जाए। यदि राजस्व अदालत के पीठासीन अधिकारी ने आदेश का पालन नहीं किया तो संबंधित उच्च अधिकारियों को उसके खिलाफ उचित कार्रवाई करने के निर्देश दिए जाएंगे। इसमें वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज करना भी शामिल है।
अदालत ने राजस्व अदालतों में मामलों के लंबे समय तक लंबित रहने को व्यवस्था की “कड़वी हकीकत” बताते हुए कहा कि इसके पीछे मुख्य कारण अनावश्यक स्थगन लेने की प्रवृत्ति है। अदालत ने कहा कि इस कार्य संस्कृति को बदलना जरूरी है।
अदालत ने कहा,
“मानव जीवन छोटा और सीमित है, जबकि मुकदमेबाजी अनंत है।”
व्यक्ति कुछ समय के लिए जीवित रहता है, लेकिन मुकदमे पीढ़ियों तक चलते रहते हैं और कई बार उन्हें शुरू करने वाले पक्षकारों से भी अधिक समय तक जारी रहते हैं। अदालत ने कहा कि “न्याय में देरी, न्याय से वंचित करना है” केवल कहावत नहीं, बल्कि राजस्व अदालतों की मौजूदा व्यवस्था की कड़वी हकीकत है।
मामला वर्ष 1963 में दायर एक शिकायत से जुड़ा है, जिसमें दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 145 के तहत कार्यवाही 63 वर्षों से लंबित है। याचिका में इस मामले के शीघ्र निपटारे के लिए निर्देश देने की मांग की गई।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों पक्ष मामले के निपटारे में रुचि नहीं रखते और इसी वजह से सुनवाई एक तारीख से दूसरी तारीख तक टाली जाती रही। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी पक्षकार को कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग करने या अपनी सुविधा के अनुसार मुकदमे को अनिश्चितकाल तक खिंचवाने का अधिकार नहीं है।
अदालत ने कहा कि बार-बार और अनावश्यक स्थगन लेने की प्रवृत्ति “कैंसर की तरह” फैल गई है, जो पूरी न्यायिक व्यवस्था को कमजोर कर रही है। नियमित रूप से ऐसे स्थगन दिए जाने से न्याय देने की प्रक्रिया प्रभावित होती है और इस प्रवृत्ति को हतोत्साहित किया जाना चाहिए।
पीठ ने कहा,
“अब समय आ गया है कि पक्षकारों की पुरानी सोच और रवैये को बदला जाए, जिसमें मुकदमे दादा-दादी दायर करते हैं और उनका फैसला पोते-पोतियां सुनते हैं।”
अदालत ने कहा कि लंबे समय तक मामला लंबित रहने से एक पक्ष को फायदा मिलता रहता है, जबकि दूसरा पक्ष विवाद का गुण-दोष के आधार पर फैसला होने से वंचित रहता है।
हाईकोर्ट ने मौजूदा मामले को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत शीघ्र सुनवाई के अधिकार के गंभीर उल्लंघन का उदाहरण बताया। अदालत ने इसे सबसे पुराने और प्राथमिकता के आधार पर निपटाए जाने वाले मामलों की श्रेणी में रखने का निर्देश दिया।
पीठ ने संबंधित उपखंड मजिस्ट्रेट को तीन महीने के भीतर मामले का निपटारा करने का आदेश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि “अनावश्यक और अनुचित” स्थगन स्वीकार नहीं किए जाएंगे। यदि स्थगन देना बिल्कुल अपरिहार्य हो तो उसके कारण पीठासीन अधिकारी को स्वयं आदेश-पत्र में लिखित रूप से दर्ज करने होंगे।
अदालत ने यह भी कहा कि मामले को टालने की मांग करने वाले किसी भी पक्ष पर छह अंकों तक का भारी जुर्माना लगाया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि पीठासीन अधिकारी आदेश का पालन करने में विफल रहता है तो संबंधित उच्च अधिकारियों को उसके खिलाफ कार्रवाई के लिए निर्देश जारी किए जाएं। इसमें न्यायिक कर्तव्यों के निर्वहन में विफलता को उसकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में दर्ज करना भी शामिल होगा।
मामले की प्रगति पर नजर रखने की जिम्मेदारी राजस्व मंडल के रजिस्ट्रार और जिले के कलेक्टर को दी गई।
मामले में अनुपालन रिपोर्ट के लिए अगली सुनवाई 18 दिसंबर 2026 को होगी।

