पत्नी की सरपंची के बकाये के लिए पति जिम्मेदार नहीं, संलिप्तता साबित हुए बिना वसूली नहीं हो सकती: राजस्थान हाईकोर्ट
Amir Ahmad
7 Sept 2026 12:20 PM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति-पत्नी अलग-अलग कानूनी इकाइयां हैं और किसी सार्वजनिक पद पर रहते हुए एक के कथित कदाचार या गलत कार्य के लिए दूसरे को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, जब तक यह साबित न हो कि वह भी उस कृत्य में शामिल था।
जस्टिस अनूप कुमार ढांड की पीठ ने कहा कि पूर्व सरपंच के कार्यकाल से जुड़े बकाये की वसूली उसके पति या परिवार के किसी अन्य सदस्य से केवल इस आधार पर नहीं की जा सकती कि वह उसका पति है। सार्वजनिक प्रतिनिधि द्वारा किए गए कदाचार या गलत कार्य की जिम्मेदारी उसी की होती है और वसूली भी उसी से की जानी चाहिए।
मामला ग्राम पंचायत फालेंडा में पंचायत चुनाव लड़ने के इच्छुक एक व्यक्ति से जुड़ा था। चुनाव लड़ने के लिए संबंधित विभाग से बकाया नहीं होने का प्रमाण पत्र जरूरी था। लेकिन विभाग ने यह प्रमाण पत्र जारी करने से इनकार कर दिया, क्योंकि उसकी पत्नी के सरपंच रहते 1995 से 2000 के बीच किए गए कुछ कार्यों से संबंधित कथित बकाया राशि उसके नाम लंबित है।
इन बकायों को लेकर पत्नी के खिलाफ नीलामी और कुर्की की कार्रवाई शुरू की गई। उसने इसके खिलाफ अदालत का रुख किया, जिस पर नीलामी की कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगाई थी और मामला अभी लंबित है।
पति ने हाईकोर्ट में दलील दी कि पत्नी के सरपंच कार्यकाल के बकाये के आधार पर उसे पंचायत चुनाव लड़ने से नहीं रोका जा सकता। पंचायत राज अधिनियम, 1994 में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, जिसके तहत पति को पत्नी के बकाये के कारण चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराया जाए।
राज्य सरकार ने इसके विपरीत तर्क दिया कि पति अपनी पत्नी के बकाये का भुगतान करने के लिए बाध्य है।
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति की देनदारी के लिए जमानतदार या गारंटर को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, लेकिन इस मामले में याचिकाकर्ता अपनी पत्नी का न तो जमानतदार था और न ही गारंटर। बकाये की वसूली का मामला राज्य और पूर्व सरपंच के बीच है, इसलिए पति को अपनी पत्नी का बकाया चुकाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा कि पंचायत राज अधिनियम, 1994 या पंचायत राज नियम, 1996 में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, जो सरपंच द्वारा राशि जमा न करने की स्थिति में उसके परिवार के सदस्यों से उस राशि की वसूली की अनुमति देती हो। यदि किसी सार्वजनिक प्रतिनिधि पर कोई राशि बकाया है और वह उसका भुगतान नहीं करता तो इसे उसके परिवार के सदस्यों की नागरिक या दंडात्मक जिम्मेदारी नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने इसे अधिकारियों की ओर से मामले पर उचित तरीके से विचार नहीं करने का स्पष्ट उदाहरण बताया और पति को उसकी पत्नी के बकाये का भुगतान करने के लिए मजबूर किए जाने पर नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि पति को तभी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, जब जांच में यह साबित हो कि वह पंचायत के कामकाज या अपनी पत्नी के कदाचार में भी शामिल था।
हाईकोर्ट ने याचिका मंजूर करते हुए राज्य सरकार को याचिकाकर्ता को बकाया नहीं होने का प्रमाण पत्र जारी करने का निर्देश दिया।


