मातृत्व और स्तनपान का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 का हिस्सा: राजस्थान हाईकोर्ट ने नवजात की मां के तबादले पर लगाई रोक, सरकार से नीति बनाने को कहा
Amir Ahmad
27 Oct 2026 11:37 AM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने दो महीने के बच्चे की मां के दूर-दराज के स्थान पर किए गए तबादले पर रोक लगाते हुए राज्य सरकार को उसके मामले पर मानवीय और सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण से दोबारा विचार करने का निर्देश दिया।
अदालत ने कहा कि सामान्य रूप से यह माना जाता है कि एक साल से कम उम्र के बच्चे की मां के तबादले से, जहां तक संभव हो, बचना चाहिए। ऐसे मामलों पर प्रशासनिक आदेशों की तरह यांत्रिक ढंग से नहीं, बल्कि संवेदनशीलता के साथ विचार किया जाना चाहिए।
जस्टिस अनूप कुमार ढांड की पीठ ने कहा कि मातृत्व का अधिकार और शिशु के स्तनपान का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब किसी मामले में छोटे बच्चे का हित जुड़ा हो, तो विचार का केंद्र केवल प्रशासनिक सुविधा नहीं रह जाता, बल्कि बच्चे का सर्वोत्तम हित सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है।
अदालत ने कहा कि मातृत्व, स्तनपान करने और शिशु को स्तनपान कराने तथा उसका पालन-पोषण करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का हिस्सा माना गया है। दो महीने के बच्चे को दूर-दराज के स्थान पर तबादले के कारण उसकी मां से अलग करना मां और बच्चे, दोनों को इस महत्वपूर्ण अधिकार से वंचित करने जैसा होगा। इससे बच्चे को गंभीर मनोवैज्ञानिक आघात, असुरक्षा, कुपोषण और स्वास्थ्य संबंधी खतरे हो सकते हैं, जिनकी भरपाई संभव नहीं होगी।
हाईकोर्ट ने कहा कि एक आदर्श नियोक्ता के रूप में राज्य का दायित्व है कि वह मां और बच्चे के इस पवित्र संबंध की रक्षा करे, न कि बिना संवेदनशीलता के तबादला आदेश जारी करके इसे तोड़े।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि हाल ही में बच्चे को जन्म देने वाली या शिशु की देखभाल कर रही महिला कर्मचारियों के तबादले से जुड़ी ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए राज्य में उचित नीति का अभाव है। उसने सरकार से ऐसी स्थानांतरण नीति बनाने का आग्रह किया, जो मां और शिशु दोनों को होने वाली कठिनाइयों को ध्यान में रखे।
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता सवाई माधोपुर के गंगापुर में वरिष्ठ अध्यापिका के पद पर तैनात थीं। बच्चे को जन्म देने के महज दो महीने बाद उनका तबादला करौली जिले के मासलपुर में कर दिया गया। उन्होंने तबादले के खिलाफ अपील दायर करते हुए कहा कि इतनी दूर तैनाती से शिशु की देखभाल करने में गंभीर कठिनाइयां आएंगी। हालांकि, उनकी अपील खारिज कर दी गई, जिसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।
पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने कहा कि तबादला आदेश न केवल राज्य सरकार की स्थानांतरण नीति के विपरीत था, बल्कि मानवीय सिद्धांतों और संविधान के अनुच्छेद 21 की भावना के भी खिलाफ था।
मातृत्व के महत्व पर जोर देते हुए अदालत ने कहा कि मातृत्व सभी सभ्यताओं का आधार है और किसी भी सभ्यता ने मां की शक्ति को पहचाने बिना विकास नहीं किया है। मां की तुलना अक्सर देवी से की जाती है। मां वह है, जो दूसरों की जगह ले सकती है, लेकिन उसकी जगह कोई दूसरा नहीं ले सकता। मां और बच्चे का रिश्ता विशेष होता है, जो समय या दूरी से नहीं बदलता। यह निस्वार्थ और सच्चा प्रेम है।
हाईकोर्ट ने कहा कि बच्चे के जीवन के शुरुआती दिन, विशेष रूप से पहले छह महीने तक केवल स्तनपान, उसके शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ भी इस अवधि को बच्चे के विकास के लिहाज से बेहद अहम मानते हैं।
अदालत ने कहा कि बच्चे की देखभाल, मां की देखभाल और शिशु का कल्याण सामाजिक न्याय के अभिन्न अंग हैं। इसलिए स्तनपान कराने वाली महिला कर्मचारियों के मामलों में अधिक मानवीय, सहानुभूतिपूर्ण और संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि शिशु की इतनी कम उम्र में मां का तबादला करना मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961, में 2017 में किए गए संशोधन, बाल देखभाल अवकाश से संबंधित नियमों और बाल अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन की भावना के विपरीत है।
इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह दो महीने के शिशु के हित को ध्यान में रखते हुए याचिकाकर्ता के मामले पर मानवीय और सहानुभूतिपूर्ण तरीके से दोबारा विचार करे। पुनर्विचार किए जाने तक तबादला आदेश पर रोक लगा दी गई।
अदालत ने यह भी कहा कि अब समय आ गया कि राज्य सरकार महिला कर्मचारियों के ऐसे तबादलों से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए स्पष्ट नीति तैयार करे। हाईकोर्ट की रजिस्ट्री को आदेश की प्रति कानून एवं न्याय मंत्रालय को भेजने का निर्देश भी दिया गया।

