भ्रष्टाचार का मामला लंबित होने से विभागीय आरोपपत्र रद्द नहीं हो सकता: राजस्थान हाईकोर्ट
Amir Ahmad
27 Oct 2026 1:04 PM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में प्राथमिकी दर्ज होने से विभागीय जांच और आरोपपत्र की कार्रवाई पर रोक नहीं लगती। आपराधिक मामला और विभागीय कार्यवाही दोनों अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं और कानून के तहत एक साथ जारी रह सकती हैं।
जस्टिस अनूप कुमार ढांड की सिंगल बेंच ने कहा कि सामान्यतः विभागीय कार्यवाही में जारी आरोपपत्र को चुनौती देने वाली याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती, जब तक यह साबित न हो कि आरोपपत्र जारी करने वाला अधिकारी अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने के लिए सक्षम नहीं था।
अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपपत्र में हस्तक्षेप सामान्य तरीके से या हल्के में नहीं किया जाना चाहिए। कर्मचारी को शुरुआती चरण में आरोपपत्र रद्द कराने की मांग करने के बजाय जांच अधिकारी या अनुशासनात्मक प्राधिकारी के समक्ष अपना जवाब प्रस्तुत करना चाहिए और जांच पूरी होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए।
मामले में याचिकाकर्ता को राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1958 के नियम 16 के तहत आरोपपत्र जारी किया गया। आरोप था कि उसने रिश्वत की मांग की, जो राजस्थान सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1971 के नियम 14 और 15 के तहत कदाचार की श्रेणी में आता है।
याचिकाकर्ता ने आरोपपत्र को चुनौती देते हुए दलील दी कि इन्हीं आरोपों के संबंध में जयपुर स्थित भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो में उसके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2018 के तहत FIR दर्ज की गई। उसका तर्क था कि समान आरोपों के आधार पर विभाग एक ओर आपराधिक मामला दर्ज कर और दूसरी ओर विभागीय आरोपपत्र जारी कर उसके खिलाफ दोहरी कार्रवाई नहीं कर सकता।
अदालत ने इन दलीलों पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट के स्टैंज टोयोटेत्सु इंडिया प्राइवेट लिमिटेड बनाम गिरीश वी. एवं अन्य मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया। इसके आधार पर अदालत ने कहा कि आपराधिक मामला और विभागीय जांच अलग-अलग कार्यवाही हैं तथा इन्हें एक साथ चलाया जा सकता है।
अदालत के अनुसार आपराधिक मामले में आरोप साबित होने पर आरोपी के खिलाफ अभियोजन चलाकर कानून के तहत दंड दिया जा सकता है जबकि विभागीय जांच में आरोप साबित होने पर कर्मचारी को सेवा नियमों के अनुसार दंडित किया जा सकता है। विभागीय जांच में आरोपों को संभावनाओं की प्रबलता के आधार पर परखा जाता है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल करते हुए आरोपपत्र में लगाए गए आरोपों की सत्यता और शुद्धता की जांच करना सामान्यतः उचित नहीं है। जांच पूरी होने से पहले केवल इस आधार पर आरोपपत्र रद्द नहीं किया जा सकता कि उसमें लगाए गए आरोप गलत हैं, क्योंकि आरोपों की सत्यता पर निर्णय लेना अनुशासनात्मक प्राधिकारी का काम है।
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका का निस्तारण किया। हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता को जांच अधिकारी के समक्ष अपने सभी उपलब्ध बचाव और दलीलें प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता दी।

