चेक बाउंस मामले में अपील के दौरान 20% मुआवजा जमा करना होगा, संशोधन कानून रद्द होने से नहीं बदलेगा नियम: राजस्थान हाईकोर्ट

  • चेक बाउंस मामले में अपील के दौरान 20% मुआवजा जमा करना होगा, संशोधन कानून रद्द होने से नहीं बदलेगा नियम: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि परक्राम्य लिखत अधिनियम (NI Act) में धारा 148 जोड़ने वाले वर्ष 2018 के संशोधन कानून को वर्ष 2025 में निरस्त किए जाने से यह प्रावधान समाप्त नहीं हुआ है। चेक बाउंस मामले में दोषसिद्ध व्यक्ति को अपील लंबित रहने के दौरान निचली अदालत द्वारा निर्धारित मुआवजे की कम से कम 20 प्रतिशत राशि जमा करने का आदेश दिया जा सकता है।

    जस्टिस अनिल कुमार उपमन की पीठ ने कहा कि जब किसी संशोधन को मूल कानून में शामिल कर दिया जाता है तो वह मूल कानून का अभिन्न हिस्सा बन जाता है। इसके बाद संशोधन कानून को अलग से निरस्त किए जाने से मूल कानून में शामिल प्रावधान की वैधता समाप्त नहीं होती।

    हाईकोर्ट एक ऐसे व्यक्ति की अपील पर सुनवाई कर रहा था, जिसे चेक बाउंस मामले में दोषी ठहराया गया। अपीलीय अदालत ने उसे निचली अदालत द्वारा निर्धारित मुआवजे की 20 प्रतिशत राशि जमा करने का निर्देश दिया। दोषी ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

    याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि NI Act की धारा 148 को वर्ष 2018 के संशोधन कानून के माध्यम से शामिल किया गया। इस संशोधन कानून को निरसन एवं संशोधन अधिनियम, 2025 के जरिए समाप्त कर दिया गया है। ऐसे में याचिकाकर्ता के अनुसार, धारा 148 के तहत राशि जमा करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता।

    याचिकाकर्ता ने यह भी दलील दी कि धारा 148 में 'कर सकता है' शब्द का इस्तेमाल किया गया, जिससे राशि जमा कराने का आदेश देना हर स्थिति में अनिवार्य नहीं है।

    इस संबंध में उसने सुप्रीम कोर्ट के जम्बू भंडारी बनाम मध्य प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम मामले का हवाला दिया। इस फैसले के अनुसार, यदि अपीलीय अदालत को लगता है कि राशि जमा करने की शर्त अन्यायपूर्ण होगी और इससे अपील करने के अधिकार से वंचित होने जैसी स्थिति पैदा होगी, तो असाधारण परिस्थितियों में छूट दी जा सकती है।

    याचिकाकर्ता ने दावा किया कि 20 प्रतिशत राशि जमा करने की शर्त उसके लिए अत्यधिक आर्थिक बोझ पैदा करेगी। इसलिए उसके मामले को भी असाधारण परिस्थिति मानते हुए इस शर्त से छूट दी जानी चाहिए।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के इंडिपेंडेंट स्कूल्स फेडरेशन ऑफ इंडिया बनाम भारत संघ मामले का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया कि संशोधन कानून को निरस्त किए जाने के बाद भी मूल कानून में शामिल किया गया संशोधन प्रभावी बना रहता है।

    हाईकोर्ट ने सामान्य खंड अधिनियम की धारा 6-ए का भी उल्लेख किया। यह प्रावधान किसी दूसरे केंद्रीय कानून में संशोधन करने वाले अधिनियम को निरस्त किए जाने की स्थिति में पहले से किए गए संशोधनों की निरंतरता से संबंधित है।

    जस्टिस उपमन ने कहा कि कानून की व्याख्या का स्थापित सिद्धांत है कि किसी संशोधन को मूल अधिनियम में शामिल कर दिए जाने के बाद वह उसी कानून का हिस्सा बन जाता है और अपनी कानूनी शक्ति मूल अधिनियम से प्राप्त करता है। इसलिए संशोधन कानून को निरस्त करने से केवल उस स्वतंत्र कानून का अस्तित्व समाप्त होता है, न कि मूल अधिनियम में पहले से शामिल किए गए संशोधन का।

    अदालत ने आर्थिक परेशानी से जुड़ी दलील पर कहा कि केवल वित्तीय कठिनाई का हवाला देना अपने आप में ऐसी असाधारण परिस्थिति नहीं है, जिसके आधार पर राशि जमा करने की शर्त से छूट दी जा सके।

    इन टिप्पणियों के साथ राजस्थान हाईकोर्ट ने अपील खारिज की। फैसले से स्पष्ट है कि चेक बाउंस मामलों में अपील के दौरान मुआवजे की 20 प्रतिशत राशि जमा करने से संबंधित धारा 148 केवल वर्ष 2018 के संशोधन कानून के निरस्त होने के कारण अप्रभावी नहीं हुई है।

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