S.311 CrPC | सबूत बंद होने के बाद भी गवाह को दोबारा बुला सकती है अदालत, धारा 362 की रोक लागू नहीं होगी: राजस्थान हाईकोर्ट
Amir Ahmad
2 Sept 2026 12:28 PM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने अहम फैसले में कहा कि आपराधिक अदालतें दोनों पक्षों की गवाही पूरी होने के बाद भी दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 311 के तहत किसी महत्वपूर्ण गवाह को दोबारा बुलाकर उसकी गवाही करा सकती हैं।
अदालत ने स्पष्ट किया कि इस शक्ति का इस्तेमाल करने के लिए यह देखना जरूरी नहीं है कि सबूत बंद हो चुके हैं या नहीं, बल्कि मुख्य सवाल यह है कि संबंधित गवाह की गवाही मामले में न्यायपूर्ण फैसला देने के लिए जरूरी है या नहीं।
जस्टिस अनिल कुमार उपमन की अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि CrPC की धारा 362, जिसके तहत अदालत अपने हस्ताक्षर किए गए फैसले या अंतिम आदेश को बदल या उसकी समीक्षा नहीं कर सकती, मुकदमे की सुनवाई लंबित रहने के दौरान धारा 311 के तहत गवाह को दोबारा बुलाने की अदालत की स्वतंत्र शक्ति पर रोक नहीं लगाती।
अदालत ने कहा कि अंतिम फैसला सुनाए और उस पर हस्ताक्षर किए जाने से पहले अदालत केवल इसलिए अपने अधिकार से बाहर नहीं हो जाती कि किसी गवाह की गवाही पहले ही बंद कर दी गई। धारा 311 और धारा 362 अलग-अलग क्षेत्रों में काम करती हैं और दोनों प्रावधानों को एक-दूसरे के अनुरूप समझा जाना चाहिए। इसलिए धारा 362 को धारा 311 के तहत ऐसे गवाह को बुलाने, दोबारा गवाही कराने या उसकी फिर से जांच करने पर पूर्ण रोक नहीं माना जा सकता जिसकी गवाही पहले बंद हो चुकी है बशर्ते अदालत को लगे कि उसकी गवाही मामले में न्यायपूर्ण फैसला देने के लिए जरूरी है।
मामला निचली अदालत के उस आदेश के खिलाफ दायर याचिका से जुड़ा था, जिसमें धारा 311 के तहत गवाहों को दोबारा बुलाने की मांग खारिज कर दी गई। याचिकाकर्ता शिकायतकर्ता है, जिसने मामले में FIR दर्ज कराई। उसने और कुछ अन्य महत्वपूर्ण गवाहों ने मुकदमे के दौरान गवाही दी थी। बाद में कुछ अन्य लोगों को भी आरोपी बनाया गया और उनके खिलाफ आरोप तय किए गए। हालांकि, नए आरोपियों के संबंध में पहले से गवाही दे चुके याचिकाकर्ता और अन्य महत्वपूर्ण गवाहों से दोबारा पूछताछ नहीं की गई और निचली अदालत ने साक्ष्य बंद कर दिया।
इसके बाद याचिकाकर्ता ने धारा 311 के तहत आवेदन देकर इन गवाहों को दोबारा बुलाने की मांग की। निचली अदालत ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि अभियोजन पक्ष की गवाही बंद होने के बाद इस शक्ति का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी माना कि धारा 362 के कारण ऐसा करना संभव नहीं है। इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 311 अदालत को काफी व्यापक शक्ति देती है। इस प्रावधान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी मामले में न्यायपूर्ण फैसला देने के लिए जरूरी सभी महत्वपूर्ण साक्ष्य अदालत के सामने मौजूद हों।
अदालत ने कहा कि धारा 311 के तहत आवेदन पर विचार करते समय केवल यह देखना महत्वपूर्ण नहीं है कि आवेदन मुकदमे के किस चरण में दाखिल किया गया है। असली सवाल यह है कि जिस व्यक्ति को गवाही के लिए बुलाया जाना है उसकी गवाही मामले के न्यायपूर्ण निपटारे के लिए जरूरी दिखाई देती है या नहीं।
इस संबंध में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले मोहनलाल शामजी सोनी बनाम भारत संघ का भी उल्लेख किया। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आपराधिक अदालत के पास किसी व्यक्ति को गवाह के तौर पर बुलाने या पहले गवाही दे चुके व्यक्ति को दोबारा बुलाकर उसकी फिर से जांच करने की पर्याप्त शक्ति है भले ही दोनों पक्षों के साक्ष्य बंद हो चुके हों।
हाईकोर्ट ने धारा 362 को लेकर निचली अदालत की दलील भी खारिज की। अदालत ने कहा कि धारा 362 और धारा 311 के बीच कोई टकराव नहीं है। धारा 362 उस स्थिति में अदालत को अपने फैसले या अंतिम आदेश में बदलाव या उसकी समीक्षा करने से रोकती है, जब उस पर हस्ताक्षर हो चुके हों। इसके विपरीत धारा 311 जांच या मुकदमे के किसी भी चरण में इस्तेमाल की जा सकने वाली स्वतंत्र शक्ति है।
अदालत ने कहा कि अंतिम फैसला सुनाए जाने और उस पर हस्ताक्षर किए जाने से पहले मुकदमा लंबित रहता है। ऐसे में किसी गवाह की गवाही पहले बंद हो जाने मात्र से अदालत अपने अधिकार से बाहर नहीं हो जाती।
मौजूदा मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि जिन गवाहों को दोबारा बुलाने की मांग की गई थी वे नए गवाह नहीं थे। वे पहले ही अभियोजन पक्ष की ओर से महत्वपूर्ण गवाही दे चुके थे। बाद में कुछ नए आरोपियों को मामले में शामिल किए जाने के कारण उनकी दोबारा जांच जरूरी हो गई। ऐसे में अदालत ने माना कि धारा 311 के तहत दायर आवेदन को मंजूर किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने निचली अदालत का आदेश रद्द करते हुए संबंधित गवाहों को बुलाने और उनकी दोबारा गवाही दर्ज करने का निर्देश दिया। फैसले में अदालत ने साफ किया कि किसी आपराधिक मामले में न्यायपूर्ण निर्णय के लिए जरूरी साक्ष्य सामने लाना अदालत का महत्वपूर्ण दायित्व है और केवल इस आधार पर महत्वपूर्ण गवाह की दोबारा गवाही से इनकार नहीं किया जा सकता कि साक्ष्य पहले ही बंद किए जा चुके हैं।


