गंभीर अपराध में दोषसिद्धि से पेंशन अपने आप जब्त नहीं हो सकती, सुनवाई का मौका देना जरूरी: राजस्थान हाईकोर्ट
Amir Ahmad
17 Sept 2026 12:08 PM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश में कहा कि किसी कर्मचारी के गंभीर अपराध में दोषी ठहराए जाने के आधार पर उसकी पूरी पेंशन स्वतः रोकना या जब्त करना उचित नहीं है। संबंधित प्राधिकारी को पेंशन पर दंडात्मक कार्रवाई करने से पहले कर्मचारी को नोटिस देकर अपना पक्ष रखने और परिस्थितियां बताने का उचित अवसर देना जरूरी है।
जस्टिस आनंद शर्मा की पीठ ने राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम के सेवानिवृत्त सहायक लेखा अधिकारी की पूरी पेंशन रोकने और जब्त करने का आदेश रद्द किया। कोर्ट ने कहा कि भले ही कर्मचारी की दोषसिद्धि साबित हो गई हो, फिर भी उसे प्रस्तावित दंड की प्रकृति और सीमा के संबंध में अपनी परिस्थितियां प्राधिकारी के समक्ष रखने का अधिकार है।
मामले के अनुसार याचिकाकर्ता वर्ष 2023 में राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम से सहायक लेखा अधिकारी के पद से रिटायर हुआ था। उसके खिलाफ वर्ष 2011 में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत FIR दर्ज की गई। इसी मामले को लेकर विभागीय जांच भी शुरू की गई। रिटायरमेंट के समय आपराधिक मामला और विभागीय जांच दोनों लंबित थे। इसके चलते उसे अनंतिम पेंशन और 50 प्रतिशत ग्रेच्युटी दी गई।
बाद में आपराधिक मामले में याचिकाकर्ता को दोषी ठहरा दिया गया। इसके आधार पर विभाग ने आदेश जारी कर कहा कि वह पेंशन पाने का हकदार नहीं है। इस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई।
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि विभाग का आदेश राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम कर्मचारी पेंशन विनियम, 1989 के विनियम-4 के विपरीत है। इस प्रावधान के तहत गंभीर अपराध में दोषसिद्ध पेंशनभोगी की पेंशन बंद करने जैसी कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन इसके लिए संबंधित कर्मचारी को नोटिस देना आवश्यक है।
विभाग ने याचिका की सुनवाई पर प्रारंभिक आपत्ति जताते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने वैकल्पिक उपाय का इस्तेमाल किए बिना सीधे हाईकोर्ट का रुख किया, इसलिए याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।
कोर्ट ने इस आपत्ति को स्वीकार नहीं किया। पीठ ने कहा कि वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने का सिद्धांत कोई कठोर नियम नहीं है और कुछ परिस्थितियों में हाईकोर्ट रिट याचिका पर सुनवाई कर सकता है। खासकर तब, जब संबंधित आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन से प्रभावित हो।
कोर्ट ने पाया कि विनियम-4 के तहत निर्धारित प्रक्रिया का वास्तविक रूप से पालन नहीं किया गया। याचिकाकर्ता को पेंशन रोकने या जब्त करने का आदेश पारित करने से पहले कोई नोटिस ही नहीं दिया गया।
पीठ ने रामजीलाल जांगिड़ बनाम राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम एवं अन्य मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें समान परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने माना कि पेंशन कोई अनुकंपा या उपकार नहीं, बल्कि लंबे समय तक सेवा देने के बाद कर्मचारी को प्राप्त वैधानिक अधिकार है। पेंशन से वंचित करने या उसे स्थायी रूप से रोकने वाले आदेश के गंभीर कानूनी और नागरिक परिणाम होते हैं। इसलिए जब तक कानून में स्पष्ट रूप से इससे अलग व्यवस्था न हो, ऐसे प्रतिकूल आदेश से पहले प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन आवश्यक है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कर्मचारी की दोषसिद्धि हो जाने के बावजूद उसे विनियम-4 के तहत प्रस्तावित दंड की प्रकृति और सीमा के संबंध में अपनी परिस्थितियां प्राधिकारी के सामने रखने का महत्वपूर्ण अधिकार है।
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने पेंशन रोकने और जब्त करने का विभागीय आदेश रद्द किया और मामले को नए सिरे से विचार के लिए विभाग को वापस भेज दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को कारण बताओ नोटिस जारी कर उचित सुनवाई का अवसर दिया जाए और उसके बाद कानून के अनुसार नया आदेश पारित किया जाए।
साथ ही, हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि नया आदेश पारित होने तक याचिकाकर्ता की पेंशन बहाल की जाए और कानून के अनुसार उसका भुगतान जारी रखा जाए।


