राजस्थान हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: कंपनी डायरेक्टर की निजी संपत्तियों का विवरण केवल निदेशक होने के आधार पर नहीं मांगा जा सकता

  • राजस्थान हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: कंपनी डायरेक्टर की निजी संपत्तियों का विवरण केवल निदेशक होने के आधार पर नहीं मांगा जा सकता

    राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि किसी कंपनी के विरुद्ध धनराशि की वसूली के लिए चल रहे मुकदमे में केवल इस आधार पर कंपनी के निदेशक को अपनी निजी चल-अचल संपत्तियों का पूरा विवरण देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता कि वह कंपनी का निदेशक है। कंपनी की संपत्ति और उसके निदेशक की व्यक्तिगत संपत्ति अलग-अलग मानी जाती हैं।

    जस्टिस फरजंद अली ने एम/एस राजलक्ष्मी पाइप्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम एम/एस श्री पॉलीप्लास्ट मामले में 5 अक्टूबर 2026 को यह महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया।

    मामले में एम/एस श्री पॉलीप्लास्ट ने एम/एस राजलक्ष्मी पाइप्स प्राइवेट लिमिटेड के विरुद्ध 49 लाख 6 हजार 62 रुपये की वसूली के लिए वाद दायर किया था। यह मामला जोधपुर महानगर की वाणिज्यिक अदालत संख्या एक के समक्ष लंबित था। याचिकाकर्ता कंपनी को 17 अगस्त 2021 को एकतरफा कार्यवाही में ले लिया गया था। बाद में कंपनी द्वारा दायर आवेदन पर उसे मुकदमे में अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया। इसके लिए कुछ शर्तें भी निर्धारित की गई थीं। कंपनी के निदेशक की बीमारी के कारण लिखित बयान प्रस्तुत करने के लिए समय मांगा गया।

    निचली अदालत ने 11 मई 2022 को अंतिम अवसर देते हुए लागत जमा कराने की शर्त पर लिखित बयान प्रस्तुत करने की अनुमति दी। साथ ही कंपनी और उसके निदेशक गणपत लाल धूत को अपनी चल तथा अचल संपत्तियों का विवरण शपथपत्र के माध्यम से प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। अदालत ने यह भी कहा कि यदि इस निर्देश का पालन नहीं किया गया तो कंपनी का बचाव करने का अधिकार समाप्त कर दिया जाएगा। कंपनी ने उसी दिन अपना लिखित बयान तथा संबंधित आवेदन प्रस्तुत कर दिया और निर्धारित लागत भी जमा कर दी।

    इसके बावजूद 28 जून 2022 को निचली अदालत ने कंपनी को अपने पक्ष में साक्ष्य प्रस्तुत करने से रोक दिया और वादी के साक्ष्य की कार्यवाही आगे बढ़ा दी। इसके बाद कंपनी ने राजस्थान हाईकोर्ट की शरण ली।

    सुप्रीम कोर्ट के फैसले की गलत व्याख्या का मामला

    निचली अदालत ने संपत्तियों का विवरण मांगने के लिए सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2021 के निर्णय राहुल एस. शाह बनाम जिनेन्द्र कुमार गांधी एवं अन्य का सहारा लिया था। हाईकोर्ट ने इस निर्णय की व्याख्या करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने उचित परिस्थितियों में धनराशि की वसूली से संबंधित मुकदमे में दावे की सुरक्षा के लिए प्रतिवादी से सुरक्षा राशि या अन्य उपयुक्त सुरक्षा देने का निर्देश देने की संभावना को स्वीकार किया था। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि प्रत्येक धन-वसूली के मुकदमे में प्रतिवादी से उसकी सभी चल-अचल संपत्तियों का पूरा विवरण मांग लिया जाए।

    संपत्ति की सुरक्षा और संपत्तियों का पूरा विवरण अलग-अलग बातें

    हाईकोर्ट ने कहा कि किसी दावे की सुरक्षा के लिए सुरक्षा उपलब्ध कराने का निर्देश देना और किसी व्यक्ति से उसकी प्रत्येक चल-अचल संपत्ति का पूरा विवरण मांगना दो अलग-अलग बातें हैं।

    सुप्रीम कोर्ट के उक्त निर्णय को इस रूप में नहीं पढ़ा जा सकता कि निचली अदालत को प्रत्येक धन-वसूली के मुकदमे में प्रतिवादी की पूरी संपत्ति का विवरण मांगने का असीमित अधिकार प्राप्त हो गया है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति का प्रयोग न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति तथा न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए किया जा सकता है, लेकिन इसका प्रयोग कानून में निर्धारित प्रक्रिया के स्थान पर नहीं किया जा सकता।

    कंपनी और निदेशक की संपत्ति अलग

    फैसले में कंपनी की स्वतंत्र कानूनी पहचान के सिद्धांत को विशेष महत्व दिया गया। न्यायालय ने कहा कि कंपनी अपने आप में एक स्वतंत्र विधिक व्यक्ति होती है। वह अपने नाम से मुकदमा कर सकती है और उसके विरुद्ध मुकदमा किया जा सकता है। वह अपने नाम पर संपत्ति रख सकती है, दायित्व ग्रहण कर सकती है और अपने नाम से समझौते तथा अन्य लेन-देन कर सकती है। इसलिए कंपनी की संपत्ति उसके निदेशक या हिस्सेदार की निजी संपत्ति नहीं मानी जा सकती। इसी प्रकार केवल किसी व्यक्ति के निदेशक या हिस्सेदार होने के कारण कंपनी का दायित्व सामान्य रूप से उसकी निजी संपत्ति पर नहीं डाला जा सकता।

    न्यायालय ने कहा कि कोई व्यक्ति एक से अधिक कंपनियों में हिस्सेदार हो सकता है और अपनी स्वतंत्र आय अथवा स्रोतों से निजी संपत्तियां भी रख सकता है। केवल कंपनी में हिस्सेदारी या निदेशक का पद धारण करने से उसकी निजी संपत्तियां उस कंपनी की संपत्ति नहीं बन जातीं।

    निदेशक बदल सकता है, कंपनी बनी रहती है

    हाईकोर्ट ने कहा कि कंपनी के हिस्सेदार बदल सकते हैं और निदेशक नियुक्त या हटाए जा सकते हैं, लेकिन इससे कंपनी की स्वतंत्र कानूनी पहचान समाप्त नहीं होती। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी कंपनी के वर्तमान निदेशक की निजी संपत्ति को कंपनी की संपत्ति मान लेना कानून के मूल सिद्धांत के विपरीत होगा। निदेशक कंपनी का अधिकारी होता है। केवल निदेशक के पद पर होने के कारण वह कंपनी की संपत्तियों का निजी स्वामी नहीं बन जाता और उसकी निजी संपत्तियां भी कंपनी की संपत्ति नहीं बन जातीं।

    निजी संपत्तियों का विवरण मांगने के लिए ठोस आधार जरूरी

    अदालत ने यह भी कहा कि केवल धनराशि की वसूली का दावा लंबित होने से ही प्रतिवादी की सभी संपत्तियों का विवरण मांगने का आदेश नहीं दिया जा सकता। वादी को न्यायालय के समक्ष ऐसे तथ्य और परिस्थितियां प्रस्तुत करनी होंगी जिनसे यह स्पष्ट हो कि प्रतिवादी संभावित निर्णय की राशि की वसूली को विफल करने के उद्देश्य से अपनी संपत्ति बेचने, हटाने या समाप्त करने की तैयारी कर रहा है। केवल आशंका अथवा धनराशि की वसूली का दावा अपने आप में किसी पक्षकार को उसकी सभी चल-अचल संपत्तियों का विवरण देने के लिए बाध्य करने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।

    निर्णय से पहले संपत्ति कुर्क करने के प्रावधान से भी तुलना

    हाईकोर्ट ने दीवानी प्रक्रिया संहिता के निर्णय से पहले संपत्ति की कुर्की से संबंधित प्रावधान का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां भी केवल धनराशि का दावा पर्याप्त नहीं होता। वादी को यह बताना आवश्यक होता है कि प्रतिवादी संभावित निर्णय के क्रियान्वयन में बाधा डालने या उसे विलंबित करने के उद्देश्य से अपनी पूरी या किसी संपत्ति को बेचने अथवा न्यायालय के क्षेत्राधिकार से बाहर ले जाने वाला है।

    ऐसी परिस्थितियों में ही न्यायालय आवश्यक सुरक्षा की मांग करने या अन्य उचित कदम उठाने पर विचार कर सकता है।

    इस मामले में ऐसी कोई परिस्थिति सामने नहीं आई

    हाईकोर्ट ने पाया कि इस मामले में ऐसा कोई तथ्य अभिलेख पर नहीं था जिससे यह साबित हो कि कंपनी अपनी संपत्ति को बेचने या हटाने की तैयारी कर रही थी ताकि भविष्य में होने वाले निर्णय की राशि की वसूली को रोका जा सके।

    निचली अदालत के आदेश में भी ऐसी किसी परिस्थिति के संबंध में आवश्यक संतोष दर्ज नहीं किया गया था। न्यायालय ने माना कि निचली अदालत ने मुख्य रूप से उच्चतम न्यायालय के पूर्व निर्णय पर भरोसा करते हुए संपत्तियों का विवरण मांगा, लेकिन यह जांच नहीं की कि उस निर्णय में बताई गई परिस्थितियां वर्तमान मामले में वास्तव में मौजूद थीं या नहीं।

    गलत निर्देश का पालन नहीं करने पर बचाव का अधिकार समाप्त नहीं किया जा सकता

    हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी पक्षकार को ऐसे निर्देश का पालन नहीं करने के कारण मुकदमे में अपना पक्ष रखने से वंचित कर दिया जाए, जो स्वयं कानून के अनुरूप नहीं था, तो ऐसी कार्रवाई को कायम नहीं रखा जा सकता। न्यायालय ने कहा कि मुकदमे की प्रक्रिया का उद्देश्य विवाद का गुण-दोष के आधार पर न्यायपूर्ण निपटारा करना है। न्यायालय की प्रक्रिया किसी पक्षकार के लिए अनुचित नुकसान का कारण नहीं बननी चाहिए।

    दोनों आदेश निरस्त, कंपनी को फिर मिला मुकदमा लड़ने का अधिकार

    हाईकोर्ट ने 11 मई 2022 के उस आदेश को, जिसमें कंपनी तथा उसके निदेशक की चल-अचल संपत्तियों का विवरण मांगा गया था, संबंधित सीमा तक निरस्त कर दिया। इसके साथ ही 28 जून 2022 के उस आदेश को भी निरस्त कर दिया गया, जिसके माध्यम से कंपनी का बचाव करने का अधिकार समाप्त कर दिया गया था।

    हाईकोर्ट ने कंपनी को मुकदमे में अपना पक्ष रखने की अनुमति देते हुए निर्देश दिया कि उसके द्वारा प्रस्तुत लिखित बयान को अभिलेख पर लिया जाए। कंपनी को अपने साक्ष्य प्रस्तुत करने और कानून के अनुसार मुकदमे का बचाव करने का पूरा अवसर दिया जाए।

    अधीनस्थ अदालत को मामले की आगे की कार्यवाही शीघ्र पूरी करने के निर्देश भी दिए गए हैं। हालांकि हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि यदि आगे मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर संभावित निर्णय की प्रभावी वसूली सुनिश्चित करने के लिए कानून के अनुरूप कोई उचित आदेश आवश्यक हो, तो निचली अदालत ऐसा आदेश पारित कर सकती है।

    रजाक खान हैदर @ लाइव लॉ नेटवर्क

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