लंबी बीमारी के कारण अनुपस्थिति जानबूझकर किया गया कदाचार नहीं, राजस्थान हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी रद्द की

  • लंबी बीमारी के कारण अनुपस्थिति जानबूझकर किया गया कदाचार नहीं, राजस्थान हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी रद्द की

    राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि लंबी बीमारी के कारण कर्मचारी का ड्यूटी से अनुपस्थित रहना जानबूझकर की गई अनुपस्थिति नहीं माना जा सकता और इसके आधार पर उसे दंडित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने एक मृत कर्मचारी की बर्खास्तगी का आदेश रद्द करते हुए उसकी पत्नी को सभी सेवा और सेवानिवृत्ति संबंधी लाभ देने का निर्देश दिया।

    चीफ जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस विनीत कुमार माथुर की खंडपीठ ने यह आदेश पारित किया।

    मामले के अनुसार याचिकाकर्ता के पति वर्ष 1979 में कांस्टेबल के पद पर कार्यरत थे और तपेदिक से पीड़ित थे। बीमारी के कारण वह नियमित रूप से अपनी ड्यूटी करने की स्थिति में नहीं थे। बाद में उनके खिलाफ 57 दिनों तक जानबूझकर ड्यूटी से अनुपस्थित रहने के आरोप में विभागीय जांच शुरू की गई।

    मृत कर्मचारी ने अपनी बीमारी से संबंधित दस्तावेजों के साथ विस्तृत जवाब दाखिल किया। इसके बावजूद विभागीय जांच अधिकारी नियुक्त किया गया। जांच के दौरान दो गवाहों ने स्पष्ट रूप से बयान दिया कि कर्मचारी तपेदिक से पीड़ित था और इसी वजह से वह ड्यूटी पर उपस्थित होने की स्थिति में नहीं था।

    इसके बावजूद जांच रिपोर्ट में कर्मचारी को आरोपों का दोषी ठहराया गया और अंततः उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।

    हाईकोर्ट में कर्मचारी की पत्नी ने दलील दी कि उसके पति की अनुपस्थिति बीमारी के कारण थी और वह न तो जानबूझकर थी और न ही स्वेच्छा से। यह भी कहा गया कि दंड लगाए जाने से पहले कर्मचारी को जांच रिपोर्ट की प्रति उपलब्ध नहीं कराई गई।

    कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कृष्णकांत बी. परमार बनाम भारत संघ मामले का हवाला दिया। इस फैसले में कहा गया कि सरकारी कर्मचारी के ड्यूटी के प्रति समर्पण में कमी या उसके आचरण को कदाचार मानने और बर्खास्तगी जैसे दंड के लिए यह साबित करना जरूरी है कि अनधिकृत अनुपस्थिति जानबूझकर थी। यदि ऐसी परिस्थितियां हों, जिनके कारण कर्मचारी के लिए ड्यूटी पर उपस्थित होना या ड्यूटी करना संभव न हो, तो ऐसी अनुपस्थिति को जानबूझकर की गई अनुपस्थिति नहीं माना जा सकता।

    कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के छेल सिंह बनाम एमजीबी ग्रामीण बैंक, पाली एवं अन्य मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया कि किसी कर्मचारी को अनधिकृत अनुपस्थिति का दोषी ठहराने के लिए यह साबित करना आवश्यक है कि अनुपस्थिति जानबूझकर और स्वेच्छा से की गई।

    इन तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर पर्याप्त सामग्री मौजूद है, जिससे यह साबित होता है कि कर्मचारी की अनुपस्थिति जानबूझकर नहीं थी बल्कि लंबी बीमारी के कारण थी। राज्य यह साबित करने में विफल रहा कि उसकी अनुपस्थिति जानबूझकर की गई।कोर्ट ने इस तथ्य को भी महत्वपूर्ण माना कि दंड लगाए जाने से पहले कर्मचारी को विभागीय जांच रिपोर्ट की प्रति उपलब्ध नहीं कराई गई।

    इन आधारों पर हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी का आदेश रद्द किया और याचिकाकर्ता की पत्नी को कर्मचारी से जुड़े सभी सेवा और रिटायरमेंट संबंधी लाभ देने का निर्देश दिया।

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