दुष्कर्म और POCSO के दोषियों को भी खुली जेल में भेजने पर विचार संभव, लेकिन असाधारण परिस्थितियां जरूरी: राजस्थान हाईकोर्ट

  • दुष्कर्म और POCSO के दोषियों को भी खुली जेल में भेजने पर विचार संभव, लेकिन असाधारण परिस्थितियां जरूरी: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) या POCSO Act के तहत दुष्कर्म के दोषी कैदियों को खुली जेल शिविर में भेजने पर पूरी तरह रोक नहीं है। हालांकि, ऐसे कैदियों को खुली जेल में भेजने का स्वतः कोई अधिकार नहीं है। इसके लिए उन्हें विशेष या असाधारण परिस्थितियां साबित करनी होंगी।

    चीफ जस्टिस संजय के. अग्रवाल, जस्टिस समीर जैन और जस्टिस प्रवीर भटनागर की पूर्ण पीठ ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में संबंधित समिति को प्रत्येक कैदी के मामले का अलग-अलग आकलन करना होगा। अपराध की प्रकृति और गंभीरता, पीड़ित की उम्र, जेल में कैदी का आचरण, सुधार की संभावना, जोखिम और समाज में दोबारा शामिल होने की उसकी तैयारी जैसे पहलुओं पर विचार करना जरूरी है।

    कोर्ट राजस्थान प्रिजनर्स ओपन एयर कैंप रूल्स, 1972 के नियमों की व्याख्या से जुड़े एक संदर्भ पर सुनवाई कर रही थी। यह संदर्भ जस्टिस अनूप कुमार ढांड ने इस मुद्दे पर कानून की अलग-अलग व्याख्याओं के सामने आने के बाद भेजा था।

    नियम 3 में कुछ श्रेणियों के कैदियों को सामान्यतः खुली जेल शिविर में प्रवेश के लिए अयोग्य बताया गया। इनमें दुष्कर्म जैसे अपराधों में दोषी ठहराए गए कैदी भी शामिल हैं। हालांकि कोर्ट के सामने सवाल था कि क्या इस प्रावधान का अर्थ ऐसे कैदियों को हर परिस्थिति में खुली जेल में भेजने से रोकना है।

    पूर्ण पीठ ने कहा कि नियम में इस्तेमाल किया गया शब्द सामान्यतः पूर्ण प्रतिबंध नहीं दर्शाता। इसका अर्थ यह नहीं लगाया जा सकता कि संबंधित अपराध में दोषी ठहराए गए कैदी को किसी भी परिस्थिति में खुली जेल में भेजने के योग्य नहीं माना जा सकता। प्रत्येक मामले में नियमों के अन्य प्रावधानों के अनुसार व्यक्तिगत आकलन जरूरी है।

    कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता का सिद्धांत खुली जेल में प्रवेश का मौलिक अधिकार नहीं देता। लेकिन यह सुनिश्चित करता है कि संबंधित अधिकारी अपने विवेक का इस्तेमाल तर्कसंगत, निष्पक्ष और प्रासंगिक तथ्यों के आधार पर करें।

    खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर किसी कैदी के मामले पर विचार करने से इनकार नहीं किया जा सकता कि उसे IPC की धारा 376 या POCSO Act के तहत दोषी ठहराया गया। दूसरी ओर, केवल नियम में पूर्ण प्रतिबंध नहीं होने के आधार पर कैदी खुली जेल में भेजे जाने का दावा भी नहीं कर सकता।

    हाईकोर्ट ने कहा कि अपराध की गंभीरता, पीड़ित की उम्र और मामले के तथ्यों को ध्यान में रखना वैध है। सलाहकार समिति को कैदी के आचरण, सुधार की संभावना और समाज में पुनर्वास से जुड़े जोखिमों का आकलन करके अपने फैसले के कारण दर्ज करने होंगे।

    इस तरह राजस्थान हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ ने कानूनी सवाल का जवाब देते हुए स्पष्ट किया कि दुष्कर्म और POCSO के दोषियों को खुली जेल में भेजने पर पूर्ण रोक नहीं है लेकिन इसके लिए विशेष परिस्थितियां स्थापित करना और संबंधित समिति की ओर से मामले का उचित मूल्यांकन किया जाना आवश्यक है।

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