भर्ती प्रक्रिया पूरी हो जाने या समय बीत जाने मात्र से याचिका खारिज नहीं की जा सकती: राजस्थान हाईकोर्ट

Amir Ahmad

8 July 2026 1:00 PM IST

  • भर्ती प्रक्रिया पूरी हो जाने या समय बीत जाने मात्र से याचिका खारिज नहीं की जा सकती: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी भर्ती प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि उसके लंबित रहने के दौरान छह महीने से अधिक समय बीत गया या बाद की भर्ती प्रक्रियाएं पूरी हो चुकी हैं।

    एक्टिंग चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस मनीष शर्मा की खंडपीठ ने कहा कि अदालत में लंबित रहने के कारण किसी भी वादकारी को नुकसान नहीं उठाना चाहिए। न्यायालय की देरी का खामियाजा किसी पक्षकार को नहीं भुगतना पड़ सकता।

    अदालत ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति को केवल इस कारण न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता कि उसकी याचिका कई वर्षों तक लंबित रही।

    मामला

    मामले में अपीलकर्ता का नाम चयन सूची में था, लेकिन उसका आरोप था कि उसे दस्तावेज सत्यापन की तिथि की सूचना नहीं मिली। इसके कारण वह सत्यापन प्रक्रिया में शामिल नहीं हो सका जबकि उससे कम अंक प्राप्त अभ्यर्थियों को नियुक्ति दी गई।

    इसके बाद उसने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। हालांकि एकल पीठ ने यह कहते हुए याचिका खारिज की कि प्रतीक्षा सूची की अवधि छह महीने में समाप्त हो चुकी है और इस बीच नई भर्ती प्रक्रिया भी शुरू होकर पूरी हो गई।

    इस आदेश के खिलाफ अपीलकर्ता ने खंडपीठ का रुख किया।

    अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उसके गांव में इंटरनेट सुविधा नहीं थी इसलिए उसे दस्तावेज सत्यापन की सूचना नहीं मिल सकी। साथ ही यह भी कहा गया कि केवल लंबे समय तक याचिका लंबित रहने या नई भर्ती प्रक्रिया पूरी हो जाने के आधार पर याचिका खारिज नहीं की जा सकती।

    खंडपीठ ने एकल पीठ के इस तर्क से असहमति जताई कि समय बीत जाने या बाद की भर्ती प्रक्रिया पूरी हो जाने से याचिका स्वतः निरर्थक हो जाती है।

    अदालत ने कहा,

    "कानून का स्थापित सिद्धांत है कि न्यायालय की कार्यवाही से किसी भी व्यक्ति को नुकसान नहीं होना चाहिए।"

    हालांकि, मामले के अन्य तथ्यों पर विचार करते हुए अदालत ने पाया कि अपीलकर्ता ने उन अभ्यर्थियों को पक्षकार नहीं बनाया, जिन्हें उससे कम मेरिट होने के बावजूद नियुक्ति मिलने का दावा किया गया।

    हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले 'प्रबोध वर्मा एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य' का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी नियुक्ति को चुनौती दी जाती है, तो जिन अभ्यर्थियों की नियुक्ति प्रभावित हो सकती है उन्हें भी याचिका में पक्षकार बनाना आवश्यक है।

    इन्हीं कारणों से खंडपीठ ने एकल पीठ की दलील से असहमति जताने के बावजूद अपने स्वतंत्र परीक्षण के आधार पर अपील खारिज की।

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