मृत्यु से पहले दिया गया बयान मेडिकल प्रमाणन नहीं, दोषसिद्धि असुरक्षित: राजस्थान हाइकोर्ट ने पत्नी को जलाने के आरोप में दोषी ठहराए व्यक्ति को बरी किया

Amir Ahmad

27 Feb 2026 1:13 PM IST

  • मृत्यु से पहले दिया गया बयान मेडिकल प्रमाणन नहीं, दोषसिद्धि असुरक्षित: राजस्थान हाइकोर्ट ने पत्नी को जलाने के आरोप में दोषी ठहराए व्यक्ति को बरी किया

    राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि यदि मृत्यु मृत्यु से पहले दिया गया बयान मेडिकल प्रमाणन नहीं हो कि कथन देने वाला व्यक्ति होश में सजग और मानसिक रूप से सक्षम था तो केवल ऐसे कथन के आधार पर दोषसिद्धि सुरक्षित नहीं मानी जा सकती। इसी आधार पर अदालत ने पत्नी को कथित रूप से आग लगाकर हत्या करने के आरोप में दोषी ठहराए गए व्यक्ति को बरी कर दिया।

    खंडपीठ के जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्र शेखर शर्मा ने यह भी पाया कि कथित मृत्यु पूर्व कथन के समय मृतका की नाड़ी, ब्लड प्रेशर अथवा जलने की सीमा संबंधी कोई अभिलेख न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया। साथ ही यह भी तथ्य सामने आया कि अस्पताल से मात्र लगभग 500 फीट की दूरी पर कार्यपालक और न्यायिक मजिस्ट्रेट के कार्यालय स्थित होने के बावजूद कथन दर्ज कराने के लिए उन्हें नहीं बुलाया गया।

    मामला एडिशनल सेशन जज के उस आदेश के विरुद्ध अपील का था, जिसमें आरोपी पति को दोषी ठहराया गया। अभियोजन का आरोप था कि पति ने पत्नी पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगाई, जिससे वह 90 प्रतिशत तक झुलस गई और बाद में उसकी मृत्यु हो गई। अभियोजन का मुख्य आधार मृतका का कथित मृत्यु पूर्व कथन था, जिसे जांच अधिकारी ने दर्ज किया।

    अपीलकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि मृत्यु पूर्व कथन न तो किसी कार्यपालक या न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज किया गया और न ही यह सिद्ध किया गया कि मृतका शारीरिक एवं मानसिक रूप से कथन देने की स्थिति में थी। यह भी कहा गया कि अन्य साक्ष्यों में भी विरोधाभास मौजूद हैं।

    वहीं, लोक अभियोजक ने दलील दी कि कथन डॉक्टर की उपस्थिति में दर्ज किया गया और जांच अधिकारी तथा डॉक्टर की गवाही से इसकी पुष्टि होती है।

    सुनवाई के दौरान हाइकोर्ट ने पाया कि जांच अधिकारी ने स्वीकार किया कि मृतका की मानसिक व शारीरिक स्थिति के संबंध में डॉक्टर से कोई लिखित प्रमाणन नहीं लिया गया। केवल मौखिक पूछताछ की गई। न्यायालय के समक्ष ऐसा कोई दस्तावेज भी प्रस्तुत नहीं किया गया, जिसमें मृतका की नाड़ी, रक्तचाप या जलने की प्रतिशतता का उल्लेख हो।

    अदालत ने उस डॉक्टर के बयान पर भी विचार किया, जिसकी उपस्थिति में कथन दर्ज किया गया। डॉक्टर ने स्वीकार किया कि अन्य मरीजों में व्यस्त होने के कारण उसने मृत्यु पूर्व कथन पर मृतका की स्थिति संबंधी कोई लिखित पुष्टि या टिप्पणी नहीं की।

    इन परिस्थितियों में न्यायालय ने कहा कि यह स्थापित नहीं होता कि मृतका कथन देने के समय पूर्णतः मानसिक और शारीरिक रूप से सक्षम थी।

    पीठ ने स्पष्ट किया,

    “यदि मृत्यु मृत्यु से पहले दिया गया बयान स्वैच्छिक, सत्य और सक्षम मानसिक अवस्था में दिया गया हो तो वही दोषसिद्धि का एकमात्र आधार बन सकता है। किंतु यदि वह संदेहास्पद परिस्थितियों से घिरा हो आवश्यक प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का अभाव हो और संदेह से परे न हो तो उस पर पूर्णतः भरोसा करना न्यायोचित नहीं होगा।”

    मेडिकल प्रमाणन के अभाव, आवश्यक मेडिकल रिकॉर्ड की कमी तथा समीप स्थित मजिस्ट्रेट को न बुलाए जाने जैसी गंभीर कमियों को देखते हुए अदालत ने माना कि कथित मृत्यु मृत्यु से पहले दिया गया बयान भरोसेमंद नहीं है।

    अभियोजन साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन करने के बाद हाइकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए आरोपी पति को सभी आरोपों से बरी किया।

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