बिना मांग के पक्षकार बनाने का आदेश देना कानून का घोर दुरुपयोग, राजस्व मंडल का आदेश रद्द: राजस्थान हाईकोर्ट
Amir Ahmad
15 Jun 2026 7:13 PM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने राजस्व मंडल द्वारा पारित एक आदेश को रद्द करते हुए उसे कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग और न्यायिक मर्यादा के विपरीत करार दिया।
हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि मामले को दोबारा सुनवाई के लिए राजस्व मंडल की किसी अन्य पीठ को सौंपा जाए।
जस्टिस संजीत पुरोहित की पीठ ने कहा कि राजस्व मंडल ने जिस प्रकार बिना नोटिस जारी किए, बिना प्रभावित पक्ष को सुनवाई का अवसर दिए और बिना विलंब माफी आवेदन पर निर्णय किए ही पुनरीक्षण याचिका स्वीकार की, वह स्थापित कानूनी सिद्धांतों के खिलाफ है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता ने खातेदारी अधिकारों की घोषणा, स्थायी निषेधाज्ञा और अस्थायी निषेधाज्ञा की मांग करते हुए वाद दायर किया था।
इस वाद में संबंधित व्यक्ति (प्रतिवादी संख्या-1) को पक्षकार नहीं बनाया गया। इतना ही नहीं, उसकी ओर से स्वयं को पक्षकार बनाए जाने के लिए कोई आवेदन भी ट्रायल कोर्ट में दाखिल नहीं किया गया।
वाद लंबित रहने के दौरान निचली अदालत ने याचिकाकर्ता के पक्ष में अंतरिम राहत देते हुए विवादित संपत्ति की स्थिति यथावत बनाए रखने का आदेश दिया था। इसके बाद प्रतिवादी संख्या-1 ने राजस्व मंडल में पुनरीक्षण याचिका दायर की।
हाईकोर्ट ने पाया कि राजस्व मंडल ने पुनर्विचार याचिका पर याचिकाकर्ता को नोटिस जारी किए बिना और उसकी बात सुने बिना ही एकतरफा आदेश पारित कर दिया। इतना ही नहीं, राजस्व मंडल ने निचली अदालत को प्रतिवादी संख्या-1 को पक्षकार बनाने का निर्देश भी दे दिया, जबकि ऐसी कोई मांग पुनरीक्षण याचिका में नहीं की गई और न ही इस संबंध में कोई आवेदन ट्रायल कोर्ट में लंबित है।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यह आश्चर्यजनक है कि राजस्व मंडल ने याचिका में की गई प्रार्थना से आगे बढ़कर आदेश पारित किया।
हाईकोर्ट के अनुसार, किसी व्यक्ति को पक्षकार बनाने का निर्देश तब दिया गया, जब इसके लिए कोई आवेदन ही लंबित नहीं है।
पीठ ने यह भी गौर किया कि पुनर्विचार याचिका निर्धारित समयसीमा के बाद दाखिल की गई और उसके साथ विलंब माफी का आवेदन भी लगाया गया। इसके बावजूद राजस्व मंडल ने पहले उस आवेदन पर फैसला किए बिना सीधे मामले के गुण-दोष पर सुनवाई कर आदेश पारित किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस तरह का आदेश कानून के मूल सिद्धांतों के विपरीत है और इसे किसी भी तरह से न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि वह संबंधित पीठ की कार्यप्रणाली पर कोई टिप्पणी नहीं कर रही है लेकिन न्यायहित में मामले की सुनवाई किसी अन्य पीठ के समक्ष होना उचित होगा।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने राजस्व मंडल का आदेश रद्द करते हुए मामला पुनः विचार के लिए वापस भेज दिया और राजस्व मंडल, अजमेर के अध्यक्ष को निर्देश दिया कि वह इस मामले को किसी दूसरी पीठ को आवंटित करें।

