राज्यपाल ने कोई अपवर्जन आदेश न जारी करने पर अनुसूचित क्षेत्रों को नगर सीमा में शामिल किया जा सकता है: राजस्थान हाइकोर्ट

Amir Ahmad

13 Jan 2026 4:24 PM IST

  • राज्यपाल ने कोई अपवर्जन आदेश न जारी करने पर अनुसूचित क्षेत्रों को नगर सीमा में शामिल किया जा सकता है: राजस्थान हाइकोर्ट

    राजस्थान हाइकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा जारी उस अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिसके तहत पांचवीं अनुसूची के पैरा 6(2) के अंतर्गत अधिसूचित अनुसूचित क्षेत्रों में आने वाले कई गांवों और ग्राम पंचायत क्षेत्रों को नगर पालिका सीमा में शामिल किया गया। यह अधिसूचना राजस्थान नगर पालिका अधिनियम, 2009 की धारा 3 सहपठित धारा 329 के तहत जारी की गई।

    जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संजीत पुरोहित की डिवीजन बेंच ने यह स्पष्ट किया कि जब तक राज्यपाल द्वारा पांचवीं अनुसूची के पैरा 5(1) के अंतर्गत कोई विशेष अधिसूचना जारी कर किसी कानून को अनुसूचित क्षेत्र से बाहर करने या उसमें संशोधन करने का आदेश नहीं दिया जाता, तब तक ऐसे क्षेत्रों को नगर सीमा में शामिल करना असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता।

    हाइकोर्ट ने कहा कि किसी अनुसूचित क्षेत्र को नगर पालिका क्षेत्र में शामिल किए जाने मात्र से उसका संवैधानिक दर्जा समाप्त नहीं होता और न ही अनुच्छेद 244 तथा पांचवीं अनुसूची के तहत मिलने वाली संवैधानिक सुरक्षा कमजोर होती है। अनुसूचित क्षेत्रों से संबंधित सभी संवैधानिक संरक्षण, दायित्व और पर्यवेक्षण तंत्र पूरी तरह प्रभावी रहते हैं।

    याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि संबंधित गांव पहले से ही अनुसूचित क्षेत्र घोषित हैं, इसलिए उन पर केवल अनुसूचित क्षेत्रों के लिए निर्धारित विशेष संवैधानिक व्यवस्था ही लागू हो सकती है। उनका यह भी कहना था कि ऐसे क्षेत्रों में नगर पालिका कानून लागू करने की विधायी क्षमता राज्य विधानमंडल के पास नहीं है और संविधान का अनुच्छेद 243-ज़ेडसी(1) अनुसूचित क्षेत्रों में नगर पालिका व्यवस्था लागू करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता है।

    इन दलीलों पर विचार करते हुए हाइकोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 244(1) और पांचवीं अनुसूची की संवैधानिक योजना यह नहीं कहती कि अनुसूचित क्षेत्र सभी राज्य कानूनों से स्वतः बाहर हो जाते हैं। जब तक राज्यपाल अपने विशेष अधिकारों का प्रयोग करते हुए कोई अपवर्जन या संशोधन अधिसूचना जारी नहीं करते, तब तक राज्य द्वारा बनाया गया कानून अनुसूचित क्षेत्रों में भी लागू रहता है, बशर्ते वह पांचवीं अनुसूची में निहित संवैधानिक सुरक्षा और उद्देश्य के अनुरूप हो।

    हाइकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल किसी क्षेत्र का अनुसूचित क्षेत्र घोषित होना ही राज्य कानूनों के स्वतः लागू न होने का आधार नहीं बन सकता। यदि राज्यपाल द्वारा कोई विशेष अधिसूचना मौजूद नहीं है तो राज्य विधानमंडल द्वारा बनाया गया कानून अपनी पूरी शक्ति के साथ लागू रहेगा।

    अनुच्छेद 243-ज़ेडसी के दायरे पर टिप्पणी करते हुए हाइकोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान केवल इतना कहता है कि संविधान के भाग 9-क (नगर पालिकाओं से संबंधित) की संवैधानिक व्यवस्था अनुसूचित क्षेत्रों पर स्वतः लागू नहीं होगी। इसका अर्थ यह नहीं है कि अनुसूचित क्षेत्रों में नगर प्रशासन की कोई व्यवस्था हो ही नहीं सकती। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ऐसे क्षेत्रों में स्थानीय शासन व्यवस्था पांचवीं अनुसूची के तहत निर्धारित विशेष संवैधानिक निगरानी और सुरक्षा के अंतर्गत ही संचालित हो।

    अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 244(1), अनुच्छेद 243-ज़ेडसी और पांचवीं अनुसूची को एक साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से पढ़ा जाना चाहिए। इन प्रावधानों का संयुक्त प्रभाव यह है कि संविधान अनुसूचित क्षेत्रों की रक्षा करता है, लेकिन उन्हें शासन व्यवस्था से पूरी तरह अलग-थलग नहीं करता। ये क्षेत्र नियंत्रित और संतुलित संवैधानिक निगरानी के तहत संचालित होते हैं, न कि स्थायी रूप से सामान्य प्रशासन से अलग रखे जाते हैं।

    हाइकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी अनुसूचित क्षेत्र को नगर पालिका सीमा में शामिल करने से वहां रहने वाले अनुसूचित जनजाति समुदायों को मिलने वाली संवैधानिक सुरक्षा समाप्त नहीं होती। पांचवीं अनुसूची के तहत उपलब्ध सभी संरक्षण, जनजातीय सलाहकार परिषद की भूमिका, तथा अनुच्छेद 46 और अनुच्छेद 275(1) के तहत राज्य की जिम्मेदारियां, जिनमें जनजातीय उपयोजना भी शामिल है, पूरी तरह लागू रहती हैं। ये दायित्व संविधान के आदेश से जुड़े होते हैं और स्थानीय शासन की संरचना में बदलाव से प्रभावित नहीं होते।

    इन सभी कारणों के आधार पर राजस्थान हाइकोर्ट ने याचिकाओं को खारिज करते हुए राज्य सरकार की अधिसूचना को वैध ठहराया।

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