सीनियर सिटीजन का सम्मानपूर्वक जीवन जीना संवैधानिक दायित्व: राजस्थान हाइकोर्ट ने वृद्धाश्रमों का राज्यव्यापी लेखा-परीक्षण कराने के दिए निर्देश
Amir Ahmad
26 Feb 2026 12:28 PM IST

राजस्थान हाइकोर्ट ने कहा कि सीनियर सिटीजन को सम्मान और सुरक्षा के साथ जीवन जीने का अधिकार संविधान से प्राप्त है। इसी संदर्भ में हाइकोर्ट ने राज्य में संचालित 31 वृद्धाश्रमों की सुविधाओं और व्यवस्थाओं का व्यापक आकलन कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए।
डॉ. जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिया कि वह राज्य के सभी 31 वृद्धाश्रमों की स्थिति, उपलब्ध मूलभूत सुविधाओं, चिकित्सीय व्यवस्था और कल्याणकारी उपायों का समग्र अध्ययन कर रिपोर्ट न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करे।
अदालत ने भारत की बदलती जनसांख्यिकीय स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 2050 तक देश में सीनियर सिटीजन की आबादी लगभग 20.8 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है। ऐसे परिदृश्य में उनके लिए समर्पित सुविधाओं और कल्याणकारी उपायों का महत्व और बढ़ जाता है।
खंडपीठ ने कहा कि केवल वृद्धाश्रमों की स्थापना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि वे मूलभूत सुविधाओं, मेडिकल सेवाओं और आवश्यक देखभाल से सुसज्जित हों। न्यायालय ने टिप्पणी की कि इन संस्थानों का सही संचालन यह सुनिश्चित करता है कि वहां रहने वाले सीनियर सिटीजन सुरक्षा, सम्मान और देखभाल के वातावरण में जीवन व्यतीत कर सकें, जो संविधान की भावना और संबंधित अधिनियम के उद्देश्य के अनुरूप है।
अदालत ने कहा कि भारतीय परंपरा में बुजुर्गों का सम्मान मूल मूल्य रहा है और उनकी देखभाल को स्वाभाविक कर्तव्य माना जाता रहा है। किंतु बदलते सामाजिक और आर्थिक ढांचे के कारण पारंपरिक पारिवारिक सहारा कमजोर हुआ है, जिससे संस्थागत और कानूनी सहयोग की आवश्यकता बढ़ी है।
न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के तहत गरिमामय जीवन के अधिकार तथा अनुच्छेद 41 में वृद्धावस्था में सार्वजनिक सहायता के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि देश की विधिक और नीतिगत व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य सीनियर सिटीजन कल्याण सिद्धांतों के अनुरूप है।
खंडपीठ ने माता-पिता और सीनियर सिटीजन का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 का भी उल्लेख किया और कहा कि यह एक कल्याणकारी कानून है, जिसका उद्देश्य सीनियर सिटीजन की सुरक्षा और देखभाल सुनिश्चित करना है। अधिनियम की धारा 19 के तहत प्रत्येक जिले में निराश्रित वरिष्ठ नागरिकों के लिए वृद्धाश्रम स्थापित करने का प्रावधान है।
अदालत ने 'अश्विनी कुमार बनाम भारत संघ' मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि वृद्धाश्रमों की समय-समय पर निगरानी आवश्यक है। सीनियर सिटीजन का कल्याण केवल नीतिगत विषय नहीं, बल्कि सतत संवैधानिक चिंता का विषय है, जिसके लिए समन्वित संस्थागत प्रयास अपेक्षित हैं।
न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि देश के बड़ी संख्या में सीनियर सिटीजन ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं, जहां मेडिकल और अन्य सहायक ढांचे की उपलब्धता सीमित है। ऐसे में अधिनियम 2007 के तहत स्थापित वृद्धाश्रम मेडिकल सहायता, आश्रय और सम्मानजनक जीवन उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
जब अदालत को अवगत कराया गया कि राज्य में वर्तमान में 31 वृद्धाश्रम संचालित हो रहे हैं, तब खंडपीठ ने राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिया कि वह इन सभी संस्थानों की सुविधाओं का विस्तृत विश्लेषण कर आठ सप्ताह में रिपोर्ट प्रस्तुत करे।
मामले की अगली सुनवाई आठ सप्ताह बाद निर्धारित की गई।

