जवाई क्षेत्र में बेकाबू पर्यटन पर सख्त राजस्थान हाईकोर्ट, नाइट सफारी और ड्रोन पर रोक
Amir Ahmad
28 March 2026 12:29 PM IST

राजस्थान के पाली जिले के जवाई क्षेत्र में अनियंत्रित पर्यटन गतिविधियों पर सख्ती दिखाते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने अहम अंतरिम आदेश जारी किया। हाइकोर्ट ने नाइट सफारी पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया और सुबह 6 बजे से शाम 7 बजे के बीच ही सफारी गतिविधियों की अनुमति देने का निर्देश दिया। इसके साथ ही ड्रोन, तेज रोशनी वाले उपकरण और अन्य साधनों के इस्तेमाल पर भी रोक लगा दी गई, जो वन्यजीवों को परेशान करते हैं।
यह आदेश जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान दिया गया, जिसमें कहा गया कि जवाई क्षेत्र में बढ़ते अनियंत्रित पर्यटन से पर्यावरणीय असंतुलन पैदा हो रहा है और खासतौर पर भारतीय तेंदुओं के प्राकृतिक आवास पर गंभीर असर पड़ रहा है।
जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संदीप शाह की खंडपीठ ने संविधान के अनुच्छेद 48ए का हवाला देते हुए कहा कि राज्य का कर्तव्य है कि वह पर्यावरण, वन और वन्यजीवों की रक्षा करे। अदालत ने यह भी माना कि जवाई क्षेत्र अपनी अनूठी पारिस्थितिकी के बावजूद अब तक किसी वन्यजीव अभयारण्य या राष्ट्रीय उद्यान के संरक्षण ढांचे में शामिल नहीं है।
अदालत ने जवाई की प्राकृतिक विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां की प्राचीन ग्रेनाइट पहाड़ियां और गुफाएं भारतीय तेंदुओं के लिए आदर्श आवास रही हैं। जवाई बांध के आसपास का यह इलाका पश्चिमी राजस्थान का सबसे बड़ा जल स्रोत भी है, जो समृद्ध जैव विविधता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया कि सुबह 6 बजे से शाम 7 बजे के अलावा किसी भी प्रकार की सफारी या वन्यजीवों को खोजने की गतिविधि की अनुमति नहीं होगी।
साथ ही यह भी कहा गया कि टॉर्च, सर्च लाइट, स्पॉटलाइट या ड्रोन का उपयोग कर जानवरों को परेशान करने वालों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई की जाए।
हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि यदि सफारी वाहनों, होटल स्टाफ या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा वन्यजीवों को परेशान करने की घटना सामने आती है, तो संबंधित लोगों के खिलाफ तुरंत कानूनी कार्रवाई की जाए।
अदालत ने जवाई क्षेत्र में मानव और वन्यजीवों के बीच लंबे समय से चले आ रहे संतुलन की सराहना करते हुए कहा कि यहां की रबारी समुदाय ने तेंदुओं के साथ सह-अस्तित्व का एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया।
आदेश में कहा गया,
“यह समुदाय तेंदुओं को सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से देखता है और उनके प्रति गहरा सम्मान रखता है, जिससे दोनों के बीच संघर्ष न्यूनतम रहता है।”
हालांकि, अदालत ने चिंता जताई कि तेजी से बढ़ता पर्यटन, निर्माण गतिविधियां और अव्यवस्थित विकास इस संतुलन को बिगाड़ रहे हैं। इससे वन्यजीवों के साथ-साथ स्थानीय जीवनशैली भी खतरे में पड़ रही है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल नीतिगत विषय नहीं बल्कि जीवन के अधिकार से जुड़ा एक अनिवार्य दायित्व है, जिसके तहत राज्य को सक्रिय कदम उठाने होंगे।
मामले में राज्य सरकार को जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए गए और अगली सुनवाई 20 अप्रैल, 2026 को निर्धारित की गई।

