द्वितीय अपील में हाईकोर्ट 'तीसरी तथ्य जांच अदालत' नहीं बन सकता: राजस्थान हाईकोर्ट
Amir Ahmad
21 May 2026 1:00 PM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि दीवानी प्रक्रिया संहिता की धारा 100 के तहत द्वितीय अपील की सुनवाई करते समय हाइकोर्ट तथ्यों की तीसरी अदालत की तरह काम नहीं कर सकता। केवल इस आधार पर कि रिकॉर्ड से कोई दूसरा दृष्टिकोण संभव है, अदालत दोबारा साक्ष्यों का मूल्यांकन या तथ्यों की नई जांच नहीं कर सकती।
जस्टिस फरजंद अली की पीठ ने कहा कि निचली अदालतों द्वारा दिए गए तथ्यात्मक निष्कर्षों को सही मानने की कानूनी मान्यता होती है। इनमें हस्तक्षेप केवल तभी किया जा सकता है जब वे स्पष्ट रूप से मनमाने, कानून के विपरीत या गंभीर न्यायिक त्रुटि वाले हों।
अदालत ने कहा,
“धारा 100 के तहत हाईकोर्ट का अधिकार क्षेत्र कानून के महत्वपूर्ण प्रश्नों तक सीमित है। इसका उद्देश्य कानूनी त्रुटियों को सुधारना है, न कि निचली अदालतों द्वारा तय किए जा चुके तथ्यात्मक विवादों को फिर से खोलना।”
मामला एक द्वितीय अपील से जुड़ा था, जिसमें अपीलकर्ता ने एडिशनल जिला जज और अपीलीय अदालत के उस फैसले को चुनौती दी, जिसमें उसकी दीवानी वाद याचिका खारिज कर दी गई।
अपीलकर्ता का दावा था कि प्रतिवादी के साथ संपत्ति बेचने का एक समझौता हुआ था, लेकिन तय राशि लेने के बावजूद प्रतिवादियों ने संपत्ति किसी तीसरे व्यक्ति को बेच दी। इसी आधार पर दीवानी वाद दायर किया गया, जिसे निचली अदालतों ने खारिज कर दिया।
वहीं प्रतिवादियों ने अदालत में कहा कि संपत्ति का तीसरे पक्ष को हस्तांतरण रिकॉर्ड से स्पष्ट रूप से साबित है।
उन्होंने तर्क दिया कि मामले में कोई महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न नहीं उठता और अपीलकर्ता केवल साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन करवाना चाहता है, जिसकी अनुमति धारा 100 के तहत नहीं है।
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि द्वितीय अपील का अधिकार क्षेत्र प्रथम अपील जैसा व्यापक नहीं होता। अदालत केवल महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न होने पर ही हस्तक्षेप कर सकती है।
हाईकोर्ट ने कहा,
“द्वितीय अपील में साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन पूरी तरह अस्वीकार्य है, जब तक कि निचली अदालतों के निष्कर्ष इतने त्रुटिपूर्ण न हों कि वे न्यायिक विवेक को झकझोर दें।”
अदालत ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद कहा कि दोनों निचली अदालतों ने संतुलित दृष्टिकोण, न्यायिक सावधानी और उपलब्ध साक्ष्यों के विस्तृत परीक्षण के आधार पर निष्कर्ष निकाले थे। उनके फैसलों को मनमाना या रिकॉर्ड के विपरीत नहीं कहा जा सकता।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपीलकर्ता मूल रूप से उन्हीं तथ्यों का पुनर्मूल्यांकन चाहता है, जिनकी जांच निचली अदालतें पहले ही विस्तार से कर चुकी हैं। ऐसा करना धारा 100 के तहत हाइकोर्ट के सीमित अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
इन्हीं टिप्पणियों के साथ राजस्थान हाईकोर्ट ने द्वितीय अपील खारिज की।

