पति की अधिक आय का अर्थ पत्नी को अधिक भरण-पोषण नहीं: राजस्थान हाइकोर्ट

Amir Ahmad

3 Feb 2026 12:46 PM IST

  • पति की अधिक आय का अर्थ पत्नी को अधिक भरण-पोषण नहीं: राजस्थान हाइकोर्ट

    राजस्थान हाइकोर्ट ने पत्नी द्वारा भरण-पोषण राशि बढ़ाने की याचिका खारिज करते हुए कहा कि केवल पति की अधिक आय के आधार पर पत्नी को अधिक या निश्चित अनुपात में भरण-पोषण देना कानून का उद्देश्य नहीं है।

    हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण को पति की आय में हिस्सेदारी का साधन नहीं बनाया जा सकता।

    जस्टिस फरजंद अली ने अपने आदेश में कहा कि कानून यह नहीं कहता कि यदि पति अधिक कमाता है तो पत्नी को अनिवार्य रूप से उसकी आय का आधा या बड़ा हिस्सा दिया जाए। ऐसा करना भरण-पोषण की कार्यवाही को संपत्ति या आय के बंटवारे जैसा बना देगा, जो स्वीकार्य नहीं है।

    मामले में पत्नी ने फैमिली कोर्ट द्वारा तय किए गए 8,000 रुपये प्रति माह के भरण-पोषण को अपर्याप्त बताते हुए चुनौती दी थी।

    पत्नी का तर्क था कि पति एक सरकारी कर्मचारी है और उसकी मासिक आय 1.5 लाख रुपये से अधिक है। साथ ही उसके पास संपत्ति भी है, इसलिए भरण-पोषण की राशि बढ़ाई जानी चाहिए।

    हालांकि, हाइकोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि पति-पत्नी का वैवाहिक संबंध मात्र 57 दिनों तक ही रहा। कोर्ट ने कहा कि यद्यपि विवाह की अवधि अपने आप में भरण-पोषण के अधिकार को समाप्त नहीं करती, लेकिन यह निर्भरता, जीवनशैली के साझा अनुभव और भरण-पोषण की मात्रा तय करने में एक प्रासंगिक पहलू जरूर है।

    कोर्ट ने पत्नी की उच्च शैक्षणिक और पेशेवर योग्यता पर भी विचार किया।

    जस्टिस ने कहा कि केवल यह कहना कि पत्नी वर्तमान में बेरोजगार है, अपने आप में यह सिद्ध नहीं करता कि वह स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी दोहराया कि मात्र कमाने की क्षमता होने से पत्नी भरण-पोषण से वंचित नहीं होती, लेकिन भरण-पोषण की राशि तय करते समय उसकी योग्यता और कमाई की संभावना को ध्यान में रखा जा सकता है।

    हाइकोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि पति द्वारा नियमित रूप से भरण-पोषण राशि जमा करना उसके सद्भाव, जिम्मेदार रवैये और अदालती आदेशों के प्रति सम्मान को दर्शाता है।

    कोर्ट ने कहा कि न्याय करते समय पक्षकारों के आचरण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, क्योंकि न्याय में समानता और सद्भावना का विशेष महत्व होता है।

    इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए राजस्थान हाइकोर्ट ने पत्नी की याचिका खारिज की और फैमिली कोर्ट द्वारा तय की गई 8,000 रुपये प्रति माह की भरण-पोषण राशि बरकरार रखी।

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