अंतरिम भरण-पोषण से केवल तात्कालिक राहत, अधिकार तय नहीं होते: राजस्थान हाइकोर्ट ने 40 हजार की अंतरिम राशि बढ़ाने से किया इनकार

Amir Ahmad

9 Feb 2026 1:16 PM IST

  • अंतरिम भरण-पोषण से केवल तात्कालिक राहत, अधिकार तय नहीं होते: राजस्थान हाइकोर्ट ने 40 हजार की अंतरिम राशि बढ़ाने से किया इनकार

    राजस्थान हाइकोर्ट ने अंतरिम भरण-पोषण की राशि बढ़ाने की मांग खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि अंतरिम भरण-पोषण का उद्देश्य कार्यवाही के दौरान पीड़ित पक्ष को आर्थिक तंगी से बचाना होता है न कि पत्नी के अधिकार या भरण-पोषण की अंतिम राशि का निर्धारण करना।

    जस्टिस फरजंद अली की बेंच ने कहा कि अंतरिम भरण-पोषण एक अस्थायी और विवेकाधीन राहत है, जिसे बिना विस्तृत सुनवाई या साक्ष्य के आधार पर दिया जाता है। यह न तो पत्नी के अधिकारों का अंतिम फैसला है और न ही पति की आय में उसके किसी हिस्से को मान्यता देता है।

    अदालत ने कहा,

    “अंतरिम भरण-पोषण की प्रकृति ही यह दर्शाती है कि इस स्तर पर अदालत से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह विवादित तथ्यों पर विस्तृत जांच या गहन निर्णय करे। यह कार्य अंतिम सुनवाई और साक्ष्यों के मूल्यांकन के बाद ही किया जाता है।”

    हाइकोर्ट घरेलू हिंसा से जुड़े एक मामले में ट्रायल कोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर दो पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था। ट्रायल कोर्ट ने पत्नी को 40,000 प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश दिया। पति ने इस आदेश को चुनौती देते हुए कहा कि भरण-पोषण दिया ही नहीं जाना चाहिए, जबकि पत्नी ने पति की कथित अधिक मासिक आय का हवाला देते हुए राशि बढ़ाने की मांग की थी।

    दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाइकोर्ट ने कहा कि महिला संरक्षण अधिनियम 2005 की धारा 23 या BNS 2023 की धारा 144 के तहत अंतरिम भरण-पोषण देने की शक्ति अदालत को विवेकाधीन रूप से दी गई। यह राहत केवल कार्यवाही की अवधि तक लागू रहती है और पूरी तरह अस्थायी होती है।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस स्तर पर यह तय नहीं किया जाता कि पत्नी वास्तव में कितनी राशि की हकदार है, या वह भरण-पोषण की हकदार है भी या नहीं।

    जस्टिस फरजंद अली ने कहा,

    “अंतरिम चरण में तय की गई राशि स्वभावतः अनुमानित होती है, जो पक्षकारों की सामाजिक स्थिति पति की प्रथम दृष्टया आय क्षमता, पत्नी की आवश्यकताओं और अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों के आधार पर तय की जाती है। इसमें यह तथ्य भी शामिल है कि वर्तमान मामले में नाबालिग बच्चे की अभिरक्षा पति के पास है।”

    हाइकोर्ट ने यह भी कहा कि पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार सीमित होता है और इस स्तर पर अदालत अपीलीय न्यायालय की तरह तथ्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकती, जब तक यह न दिखे कि निचली अदालत का विवेक गंभीर कानूनी त्रुटि से ग्रस्त है या स्पष्ट रूप से अन्यायपूर्ण है।

    इन परिस्थितियों में हाइकोर्ट ने पति और पत्नी दोनों की पुनर्विचार याचिकाएं खारिज की और ट्रायल कोर्ट द्वारा तय की गई 40,000 प्रतिमाह की अंतरिम भरण-पोषण राशि में कोई हस्तक्षेप करने से इनकार किया।

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