100 से अधिक मामलों में आरोपी को हर बार पेशी के लिए लाना बोझिल: राजस्थान हाईकोर्ट ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से पेशी की दी अनुमति
Amir Ahmad
2 April 2026 11:45 AM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि जिन मामलों में किसी आरोपी के खिलाफ बड़ी संख्या में मुकदमे दर्ज हों, वहां हर बार शारीरिक रूप से अदालत में पेश करना न केवल पुलिस व्यवस्था पर बोझ डालता है बल्कि सरकारी खर्च भी बढ़ाता है। ऐसे मामलों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेशी एक व्यवहारिक और प्रभावी विकल्प है।
जस्टिस फरजंद अली की पीठ ने 100 से अधिक FIR का सामना कर रहे आरोपियों को सभी मामलों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होने की अनुमति दी।
अदालत ने कहा कि जब आरोपी की पहचान विवादित नहीं है और केवल औपचारिक उपस्थिति सुनिश्चित करनी है, तो हर बार प्रोडक्शन वारंट जारी कर भारी पुलिस बल के साथ उसे लाना उचित नहीं है।
पीठ ने टिप्पणी की,
“जब यह प्रक्रिया हर महीने कई बार दोहराई जाती है तो इससे प्रशासनिक और आर्थिक बोझ काफी बढ़ जाता है।”
अदालत ने यह भी माना कि हर बार आरोपी को लाने के लिए 4-5 पुलिसकर्मियों की टीम लगानी पड़ती है, जिससे पुलिस बल की नियमित ड्यूटी प्रभावित होती है। साथ ही, इन पेशियों पर होने वाला खर्च सीधे सरकारी खजाने पर भार डालता है।
कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि अलग-अलग जिलों में मामलों के कारण जेल प्रशासन, पुलिस और अदालतों के बीच समन्वय में कठिनाई आती है, जिससे सुनवाई में देरी और अनावश्यक लंबित मामले बढ़ते हैं।
अदालत ने कहा कि लंबी दूरी तक आरोपी को लाना सुरक्षा के लिहाज से भी जोखिम भरा होता है। यह प्रक्रिया कई बार केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है, जिससे न्याय की प्रक्रिया में कोई वास्तविक प्रगति नहीं होती।
संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा,
“जब कम हस्तक्षेप वाला और समान रूप से प्रभावी विकल्प मौजूद है तो प्रक्रिया को तर्कसंगत और संतुलित होना चाहिए।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से पेशी की अनुमति देने से न्यायालय की गरिमा या नियंत्रण पर कोई असर नहीं पड़ता, बल्कि इससे प्रशासनिक क्षमता बनी रहती है, खर्च कम होता है और सुरक्षा जोखिम भी घटते हैं।
अंततः हाईकोर्ट ने जेल प्रशासन को निर्देश दिया कि आरोपियों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होने के लिए आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।

