दोषी को प्रोबेशन मिलने के खिलाफ पीड़ित की अपील स्वीकार नहीं: राजस्थान हाइकोर्ट
Amir Ahmad
16 March 2026 1:49 PM IST

राजस्थान हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि यदि किसी दोषी को अदालत द्वारा प्रोबेशन का लाभ दिया गया तो उसके खिलाफ पीड़ित द्वारा दायर अपील दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 372 के तहत सुनवाई योग्य नहीं होती।
अदालत ने स्पष्ट किया कि पीड़ित को अपील का सीमित अधिकार दिया गया और वह सजा बढ़ाने की मांग नहीं कर सकता।
जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ ने कहा कि आपराधिक मामलों में अपील का अधिकार पूरी तरह कानून से प्राप्त होता है और उसे दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों के अनुसार ही समझा जाना चाहिए।
अदालत ने कहा कि धारा 372 के प्रावधान के अनुसार पीड़ित को केवल तीन स्थितियों में अपील करने का अधिकार है। आरोपी के बरी होने के खिलाफ कम गंभीर अपराध में दोषसिद्धि के खिलाफ या अपर्याप्त मुआवजा दिए जाने के खिलाफ। यदि आरोपी दोषी ठहराया गया है और उसे प्रोबेशन का लाभ दिया गया है तो यह इन श्रेणियों में नहीं आता।
अदालत ने कहा,
“दोषसिद्धि के बाद प्रोबेशन देना सजा की प्रक्रिया का हिस्सा है। इसे बरी होने या कम अपराध में दोषसिद्धि के बराबर नहीं माना जा सकता। सजा बढ़ाने का अधिकार केवल राज्य सरकार को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 377 के तहत है।”
मामले में आरोपी को ट्रायल कोर्ट ने स्थानीय विवाद से जुड़े अपराध में दोषी ठहराया लेकिन परिस्थितियों को देखते हुए प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स कानून की धाराओं 4 और 12 का लाभ देते हुए उसे प्रोबेशन पर रिहा कर दिया था।
इस फैसले से असंतुष्ट होकर शिकायतकर्ता ने सेशन कोर्ट में अपील दायर की।
सेशन कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द करते हुए मामले को दोबारा सुनवाई के लिए वापस भेज दिया और आरोपी को दिया गया प्रोबेशन का लाभ भी हटा दिया।
हाइकोर्ट ने कहा कि सेशन कोर्ट ने ऐसी अपील को स्वीकार करके अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्रवाई की।
अदालत ने कहा कि बिना यह दिखाए कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई गंभीर कानूनी त्रुटि या मनमानी है दोबारा सुनवाई का आदेश देना उचित नहीं था।
अदालत ने यह भी कहा कि आरोपी ने स्वेच्छा से अपना अपराध स्वीकार किया और ट्रायल कोर्ट ने सभी परिस्थितियों पर विचार करते हुए उसे प्रोबेशन का लाभ दिया था। केवल इस कारण कि शिकायतकर्ता सजा से संतुष्ट नहीं था, आरोपी को दोबारा मुकदमे का सामना करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
हाइकोर्ट ने कहा कि अपीलीय हस्तक्षेप का उद्देश्य सुधारात्मक होना चाहिए, न कि ऐसा दंडात्मक कदम जो न्यायिक निष्पक्षता को प्रभावित करे।
इन्हीं कारणों से अदालत ने आरोपी की याचिका स्वीकार करते हुए सेशन कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया।

