एक ही बार कुंद वस्तु से सिर पर वार, बिना जानलेवा मंशा के हत्या के प्रयास का अपराध नहीं : राजस्थान हाइकोर्ट
Amir Ahmad
21 Jan 2026 12:16 PM IST

राजस्थान हाइकोर्ट ने अहम निर्णय में कहा कि यदि सिर पर किसी कुंद वस्तु से केवल एक बार वार किया गया हो और उससे गंभीर चोट आई हो तो मात्र इस आधार पर इसे हत्या का प्रयास नहीं माना जा सकता, जब तक कि अभियोजन यह साबित न करे कि आरोपी की मंशा जान लेने की थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि हत्या के प्रयास के अपराध के लिए जानलेवा इरादे (हॉमिकाइडल इंटेंट) का होना अनिवार्य शर्त है।
जस्टिस फरजंद अली की पीठ ने यह टिप्पणी ट्रायल कोर्ट द्वारा धारा 307 (हत्या का प्रयास) सहित आरोप तय किए जाने को चुनौती देने वाली पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए की।
मामला
मामले में दोनों पक्ष एक ही परिवार से संबंधित थे और उनके बीच संपत्ति को लेकर लंबे समय से दीवानी और आपराधिक मुकदमे चल रहे थे। आरोप था कि इन्हीं विवादों के चलते याचिकाकर्ताओं और प्रतिवादियों के बीच दुश्मनी पनप गई।
घटना के दौरान प्रतिवादी के सिर पर लाठी से एक वार किया गया, जिससे उसे गंभीर चोट आई। ट्रायल कोर्ट ने इसे हत्या का प्रयास मानते हुए धारा 307 सहित अन्य धाराओं में आरोप तय किए।
हाइकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 307 का विश्लेषण करते हुए कहा कि इस प्रावधान का मूल और निर्णायक तत्व अपराध के समय अभियुक्त की मंशा या ज्ञान है। केवल चोट की प्रकृति या उसकी गंभीरता ही पर्याप्त नहीं है।
अदालत ने कहा कि कानून ने 'चोट' और 'गंभीर चोट' के बीच स्पष्ट वर्गीकरण किया और यह वर्गीकरण केवल औपचारिक नहीं, बल्कि दोष और सजा के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए है। धारा 307 का स्तर इन अपराधों से गुणात्मक रूप से अलग है।
हाइकोर्ट ने कहा,
“कानून ने जानबूझकर ऐसा ढांचा तैयार किया, जिससे हर मामले में यांत्रिक ढंग से धारा 307 लागू न की जाए। यह प्रावधान परिणाम को नहीं, बल्कि उस प्रयास को दंडित करता है, जो हत्या के बेहद करीब पहुंच चुका हो, और यह सब अभियुक्त की मंशा, ज्ञान और परिस्थितियों के आधार पर तय किया जाता है।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि गंभीर, जीवन के लिए खतरा पैदा करने वाली या स्थायी चोटें भी स्वतः धारा 307 को आकर्षित नहीं करतीं जब तक यह साबित न हो कि आरोपी की नीयत मृत्यु कारित करने की थी।
रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री का विश्लेषण करते हुए हाइकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा सिर पर किया गया लाठी का वार भले ही गंभीर था, लेकिन वह केवल एक ही बार किया गया। वार को इस तरह बार-बार या इतनी तीव्रता से नहीं दोहराया गया, जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि आरोपी ने जान लेने के इरादे से हमला किया।
अदालत ने पारिवारिक पृष्ठभूमि और लंबे समय से चल रहे मुकदमों का भी संज्ञान लिया और कहा कि केवल दुश्मनी या शत्रुतापूर्ण संबंध होना, अपने आप में हत्या की मंशा को साबित नहीं करता।
हाइकोर्ट ने कहा,
“यह स्थापित सिद्धांत है कि हर दुश्मनी स्वतः हत्या के इरादे में परिवर्तित नहीं होती। दुश्मनी दोधारी तलवार होती है वह घटना का कारण भी हो सकती है और झूठे फंसाए जाने का आधार भी। धारा 307 लागू करने के लिए दुश्मनी इतनी तीव्र और गंभीर होनी चाहिए कि उससे किसी को खत्म करने की स्पष्ट मंशा झलके।”
ट्रायल कोर्ट से हुई गलती
इन सभी तथ्यों और कानूनी सिद्धांतों को देखते हुए हाइकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने हत्या के प्रयास का आरोप तय करते समय त्रुटि की है।
परिणामस्वरूप पुनर्विचार याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए हाइकोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ धारा 307 का आरोप हटा दिया।

