मुस्लिम क़ानून के तहत वैध तलाक को मान्यता देना फैमिली कोर्ट का दायित्व : राजस्थान हाइकोर्ट
Amir Ahmad
21 Jan 2026 12:24 PM IST

राजस्थान हाइकोर्ट ने कहा कि यदि मुस्लिम व्यक्तिगत क़ानून के अंतर्गत तलाक-उल-हसन या मुबारात के माध्यम से विवाह का विधिवत विघटन पहले ही हो चुका है तो फैमिली कोर्ट ऐसे तलाक को मान्यता देने और विवाह विच्छेद की घोषणा करने के लिए बाध्य है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार की राहत को केवल अत्यधिक तकनीकी आधारों पर नकारा नहीं जा सकता।
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने यह टिप्पणी उस अपील पर सुनवाई करते हुए की, जो फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी की विवाह विच्छेद की घोषणा संबंधी याचिका खारिज किए जाने के आदेश के खिलाफ दायर की गई।
याचिकाकर्ता पत्नी का कहना था कि उसका विवाह मुस्लिम क़ानून के तहत पहले ही समाप्त हो चुका है। उसने यह दलील दी कि पति द्वारा तलाक-उल-हसन के माध्यम से तीन चरणों में तलाक दिया गया। इसके अतिरिक्त दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति से मुबारात का लिखित समझौता भी हुआ था। रिकॉर्ड के अनुसार, पति ने विवाह के दौरान तीन अलग-अलग तहर अवधियों में तलाक का उच्चारण किया पहला 8 जून 2024, दूसरा 8 जुलाई 2024 और तीसरा 8 अगस्त 2024 को जिसे पत्नी ने स्वीकार किया।
हालांकि, फैमिली कोर्ट ने याचिका यह कहते हुए खारिज की कि तलाक-उल-हसन की वैधता के लिए दो पुरुष गवाहों की उपस्थिति आवश्यक है। इस दृष्टिकोण को गलत ठहराते हुए हाइकोर्ट ने कहा कि दो गवाहों की यह शर्त शिया क़ानून के अंतर्गत लागू होती है, जबकि मामले के पक्षकार सुन्नी क़ानून के अधीन थे। सुन्नी क़ानून में, विशेष रूप से जब तलाक दोनों पक्षों द्वारा स्वीकार किया गया हो और विवादित न हो, ऐसी शर्त अनिवार्य नहीं है।
हाइकोर्ट ने यह भी कहा कि फैमिली कोर्ट ने पक्षकारों के बीच हुए मुबारात समझौते को नज़रअंदाज़ कर गंभीर प्रक्रिया संबंधी त्रुटि की। अदालत ने स्पष्ट किया कि मुबारात मुस्लिम क़ानून के तहत विवाह विघटन का एक मान्यता प्राप्त तरीका है। इस तरह के मामलों पर निर्णय देना फैमिली कोर्ट अधिनियम की धारा 7 के अंतर्गत फैमिली कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है।
खंडपीठ ने कहा कि फैमिली कोर्ट को गैर-न्यायिक तलाक जैसे खुला और मुबारात की वैधता की जांच एक संक्षिप्त प्रक्रिया के माध्यम से करनी चाहिए। इसमें मुख्य रूप से यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि तलाक स्वेच्छा से हुआ है, किसी दबाव या जबरदस्ती का परिणाम नहीं है और उसका उचित दस्तावेजी आधार मौजूद है। अदालत ने यह भी दोहराया कि विवाह की स्थिति घोषित करने का अधिकार फैमिली कोर्ट को विधि द्वारा प्रदान किया गया।
इस संदर्भ में हाइकोर्ट ने यह भी नोट किया कि राज्य की फैमिली कोर्टों में मुस्लिम क़ानून के तहत विवाह विच्छेद से संबंधित याचिकाओं को नियमित रूप से खारिज किए जाने की प्रवृत्ति सामने आई। इस समस्या को ध्यान में रखते हुए अदालत ने निर्देश दिया कि जब किसी याचिका में यह कहा जाए कि विवाह पहले ही मुस्लिम क़ानून के तहत गैर-न्यायिक तलाक से समाप्त हो चुका है तो फैमिली कोर्ट को दोनों पक्षों की व्यक्तिगत उपस्थिति सुनिश्चित कर उनके बयान दर्ज करने चाहिए ताकि तलाक की स्वेच्छा और वैधता को लेकर अदालत संतुष्ट हो सके। यदि तलाक किसी समझौते के रूप में दर्ज किया गया हो तो उसकी सत्यता की भी विधिवत जांच की जानी चाहिए।
इन सभी तथ्यों और कानूनी सिद्धांतों के आधार पर राजस्थान हाइकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और याचिकाकर्ता को विवाह विच्छेद की घोषणा की डिक्री का हकदार ठहराया। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि मुस्लिम व्यक्तिगत क़ानून के तहत हुए वैध गैर-न्यायिक तलाक के मामलों में राज्य की सभी फैमिली कोर्टें इस दृष्टिकोण का पालन करें।

