वर्किंग सेटर्डे के विरोध में वकीलों की हड़ताल पर राजस्थान हाइकोर्ट सख्त, कहा- अदालतों का बहिष्कार अनुच्छेद 21 के तहत वादकारियों के अधिकारों का उल्लंघन
Amir Ahmad
28 Jan 2026 12:39 PM IST

राजस्थान हाइकोर्ट ने प्रत्येक माह दो शनिवार कार्यदिवस घोषित किए जाने के फैसले के विरोध में वकीलों द्वारा की जा रही हड़ताल पर कड़ी नाराज़गी जताई। हाइकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि वकीलों को हड़ताल का कोई अधिकार नहीं है, विशेष रूप से तब, जब मामला नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा हो।
जस्टिस अनूप कुमार ढांड की एकलपीठ ने कहा कि जब वकील अदालतों का बहिष्कार करते हैं तो इससे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत वादकारियों को प्राप्त त्वरित न्याय के अधिकार का सीधा उल्लंघन होता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि विरोध का अधिकार अन्य नागरिकों के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के साथ संतुलित होना चाहिए।
यह टिप्पणी हाइकोर्ट ने उस आवेदन पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें ऐसा दोषसिद्ध व्यक्ति शामिल था, जो NDPS Act के तहत दोषी ठहराए जाने के बाद लगभग आठ वर्षों से जेल में बंद था। ट्रायल कोर्ट ने अक्टूबर, 2025 में उसकी रिहाई का आदेश पारित किया था लेकिन रिहाई की शर्तों में शामिल एक मौद्रिक शर्त पूरी न कर पाने के कारण वह अब तक जेल में ही था।
कोर्ट ने तीन अलग-अलग बार एसोसिएशनों द्वारा पारित प्रस्तावों के बाद वकीलों की हड़ताल पर गहरी असंतोष व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट के फैसले एक्स-कैप्टन हरिश उप्पल बनाम भारत संघ का हवाला दिया। इस निर्णय में कहा गया कि वकीलों को हड़ताल का कोई अधिकार नहीं है और कार्य से विरत रहना वादकारियों को बंधक बनाने जैसा है।
हाइकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि कार्यरत शनिवारों के लिए जारी कारण सूची में स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि वकीलों की उपस्थिति अनिवार्य नहीं है। इसके अतिरिक्त कोर्ट ने कहा कि बार की शिकायतों पर विचार करने के लिए पहले ही एक समिति गठित की जा चुकी है, जिसका निर्णय अभी आना शेष है।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
“हड़ताल पर जाना और अदालत के कार्य से अनुपस्थित रहना किसी समस्या का समाधान नहीं है। हर समस्या का समाधान संवाद और विमर्श से संभव है। बहस और चर्चा से बेहतर समझ विकसित होती है और समाधान निकलता है। इसके बावजूद वकीलों द्वारा हड़ताल का आह्वान या कार्य से अनुपस्थित रहना उचित नहीं है।”
हाइकोर्ट ने आगे कहा कि असहमति व्यक्त करना और अपनी राय रखना एक मौलिक अधिकार है लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है। इसे शांतिपूर्ण ढंग से इस प्रकार प्रयोग किया जाना चाहिए कि न तो सार्वजनिक व्यवस्था बाधित हो और न ही न्याय प्रक्रिया प्रभावित हो।
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाइकोर्ट ने आवेदन को स्वीकार करते हुए दोषसिद्ध व्यक्ति की रिहाई का आदेश पारित कर दिया।

