आपराधिक शिकायत की वापसी का विरोध करने का तीसरे पक्ष को अधिकार नहीं: राजस्थान हाईकोर्ट

Amir Ahmad

5 Jan 2026 3:32 PM IST

  • आपराधिक शिकायत की वापसी का विरोध करने का तीसरे पक्ष को अधिकार नहीं: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी आपराधिक शिकायत की वापसी का विरोध करने का अधिकार किसी ऐसे तीसरे पक्ष को नहीं है, जो न तो पीड़ित हो और न ही स्वयं शिकायतकर्ता।

    अदालत ने कहा कि ऐसा कोई व्यक्ति आपराधिक कार्यवाही को पुनर्जीवित कराने का दावा नहीं कर सकता।

    जस्टिस अनूप कुमार ढांड की एकल पीठ ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी, जिसमें एक निजी शिकायत को वापस लेने की अनुमति दी गई थी।

    अदालत ने चेतावनी दी कि यदि इस प्रकार की याचिकाओं को सहज रूप से स्वीकार किया गया तो कोई भी अनावश्यक हस्तक्षेप करने वाला दर्शक किसी के खिलाफ निरर्थक कार्यवाही शुरू कर सकता है, जिससे आरोपी के जीवन और स्वतंत्रता को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है।

    मामले में प्रतिवादियों के खिलाफ मानव तस्करी और जालसाजी जैसे गंभीर आरोपों को लेकर एक निजी शिकायत दायर की गई। मजिस्ट्रेट ने पुलिस रिपोर्ट तलब की, जिसमें आरोपों को असत्य पाया गया।

    इसके साथ ही यह निष्कर्ष निकाला गया कि शिकायतकर्ता साफ नीयत और प्रमाणित इरादों के साथ अदालत नहीं आया था और स्वयं शिकायतकर्ता का भी स्थानीय स्टैंडी नहीं बनता था।

    इसके बाद शिकायतकर्ता द्वारा शिकायत वापस लेने का आवेदन प्रस्तुत किया गया, जिसे ट्रायल कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।

    इस आदेश को एक ऐसे याचिकाकर्ता ने चुनौती दी जो न तो पीड़ित था और न ही शिकायतकर्ता यह आरोप लगाते हुए कि शिकायत की वापसी आरोपियों के दबाव में की गई।

    दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा,

    “वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता का न तो निचली अदालत में चल रही कार्यवाही से कोई संबंध है और न ही उसे किसी प्रकार की क्षति हुई। यह भी ऐसा मामला नहीं है कि पीड़ित या प्रभावित व्यक्ति अदालत का रुख करने में असमर्थ हो और उसकी ओर से याचिकाकर्ता उसकी शिकायत उठा रहा हो।”

    अदालत ने कहा कि कोई भी अधिकार तब तक किसी व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता, जब तक वह विधि द्वारा समर्थित न हो। चूंकि आपराधिक कानून में केवल पीड़ित या प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित व्यक्ति को ही कार्यवाही आगे बढ़ाने का अधिकार है। इसलिए किसी तीसरे पक्ष को यह अधिकार प्रदान नहीं किया जा सकता।

    हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पी.एस.आर. साधननथम बनाम अरुणाचलम का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि आपराधिक मामलों में न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए अत्यंत सतर्कता आवश्यक है।

    शिकायतकर्ता के अलावा, किसी निजी व्यक्ति की अपील केवल असाधारण परिस्थितियों में ही स्वीकार की जा सकती है, विशेषकर तब जब पीड़ित राज्य की दुर्भावना या अन्य कारणों से अदालत तक नहीं पहुंच पा रहा हो।

    इसके अतिरिक्त अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 321 के तहत अभियोजन वापसी की शक्ति पर भी प्रकाश डाला। न्यायालय ने कहा कि अभियोजन वापस लेने का अधिकार लोक अभियोजक के पास एक विशेषाधिकार के रूप में निहित है, जिसे वह स्वतंत्र रूप से और सद्भावना में प्रयोग करता है। ऐसे मामलों में अदालत की भूमिका केवल पर्यवेक्षणीय होती है न कि अपीलीय या निर्णायक।

    अंततः हाईकोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि जब लोक अभियोजक और शिकायतकर्ता को अभियोजन वापस लेने का अधिकार है तब कोई तीसरा पक्ष अदालत को शिकायत जारी रखने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।

    इसी आधार पर याचिका खारिज कर दी गई।

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