पुराना पेंशन दावा खारिज, सेवा अभिलेख खोने पर राजस्थान हाइकोर्ट ने राज्य को फटकारा
Amir Ahmad
21 Jan 2026 2:06 PM IST

राजस्थान हाइकोर्ट ने अहम फैसले में कहा कि राज्य द्वारा सेवा अभिलेख (सर्विस रिकॉर्ड) खो जाना या गुम हो जाना गंभीर प्रशासनिक चूक जरूर है, लेकिन केवल इसी आधार पर किसी कर्मचारी को पेंशन का वैधानिक अधिकार नहीं दिया जा सकता। साथ ही अदालत ने सेवा अभिलेख खोने को लेकर राज्य सरकार के रवैये पर कड़ी नाराजगी भी जताई।
जस्टिस आनंद शर्मा की पीठ ने स्पष्ट कहा कि राज्य सार्वजनिक अभिलेखों का ट्रस्टी होता है। वह यह कहकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं। अदालत ने टिप्पणी की कि सेवा अभिलेख कर्मचारी के अधिकारों और हकदारियों की बुनियाद होते हैं और इन्हें नियमों के अनुसार सुरक्षित रखना राज्य का दायित्व है। रिकॉर्ड का खो जाना कोई मामूली प्रक्रिया संबंधी चूक नहीं, बल्कि कर्तव्य में गंभीर लापरवाही है, जिसके लिए जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
मामला
यह याचिका एक सरकारी कर्मचारी द्वारा दायर की गई, जिसकी नियुक्ति वर्ष 1973 में हुई। वह वर्ष 1987 तक सेवा में रहा, जिसके बाद उसका तबादला किया गया। हालांकि याचिकाकर्ता यह साबित करने के लिए कोई दस्तावेज पेश नहीं कर सका कि उसने तबादले के बाद दोबारा कार्यभार संभाला या इस संबंध में किसी तरह की शिकायत की।
करीब दो दशक से अधिक समय तक पूरी तरह शांत रहने के बाद रिटायरमेंट की आयु पूरी करने के बाद उसने पेंशन और अन्य रिटायरमेंट लाभों की मांग की। राज्य सरकार ने इस मांग को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि कर्मचारी ने 1987 के बाद सेवा छोड़ दी थी और नियोक्ता-कर्मचारी का संबंध समाप्त हो चुका था। साथ ही यह भी कहा गया कि सेवा अभिलेख उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए दावे की जांच संभव नहीं है।
दोनों पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि केवल अनुपस्थिति के आधार पर सेवा समाप्त नहीं मानी जा सकती, जब तक कि बर्खास्तगी, त्यागपत्र या अनिवार्य रिटायरमेंट का कोई औपचारिक आदेश न हो। यह भी कहा गया कि सेवा अभिलेखों का खो जाना राज्य की गलती है और इसका नुकसान कर्मचारी को नहीं उठाना चाहिए।
वहीं राज्य सरकार ने कहा कि याचिकाकर्ता ने 1987 के बाद सेवा त्याग दी और लंबे समय तक कोई दावा नहीं किया, जिससे उसका दावा अब अवैध और असत्यापित है।
हाइकोर्ट ने कहा कि कोई भी सतर्क कर्मचारी अपने अधिकारों के लिए समय रहते आवाज उठाता है, न कि 20–25 साल बाद। अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाइकोर्ट का अधिकार क्षेत्र विवेकाधीन और न्यायसंगत है, और केवल अत्यधिक देरी के आधार पर भी राहत से इनकार किया जा सकता है।
अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट भी बार-बार यह कह चुका है कि अत्यंत पुराने और बासी सेवा विवादों को नहीं खोला जाना चाहिए। 26 साल बाद ऐसे दावे स्वीकार करने से प्रशासनिक स्थिरता और अंतिमता का सिद्धांत प्रभावित होगा।
हाइकोर्ट ने यह भी माना कि सेवा अभिलेखों का रखरखाव राज्य की कानूनी जिम्मेदारी है और उनका खो जाना निंदनीय है लेकिन इससे अपने आप याचिकाकर्ता के पक्ष में कोई वैधानिक अधिकार उत्पन्न नहीं हो जाता। याचिकाकर्ता 1987 के बाद सेवा की निरंतरता साबित करने में पूरी तरह असफल रहा।
याचिका खारिज करते हुए भी हाइकोर्ट ने सेवा अभिलेख खोने के मामले में राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने निर्देश दिया कि जिन अधिकारियों की लापरवाही से रिकॉर्ड गुम हुए हैं, उनके खिलाफ उचित कानूनी और विभागीय कार्रवाई शुरू की जाए। साथ ही चार महीने के भीतर इस संबंध में की गई कार्रवाई की विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट अदालत में पेश करने का भी आदेश दिया गया।
अदालत ने साफ कहा कि हाइकोर्ट की असाधारण अधिकारिता को वर्षों की उदासीनता और लापरवाही पर आधारित पुराने दावों को पुनर्जीवित करने का मंच नहीं बनाया जा सकता।

