APO के जरिए अनुशासनात्मक कार्रवाई से बचना गलत: राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को लगाई फटकार
Amir Ahmad
6 April 2026 1:32 PM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी पर लगे कदाचार के आरोपों से निपटने के लिए एवेटिंग पोस्टिंग ऑर्डर (APO) का सहारा नहीं लिया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में विधिसम्मत अनुशासनात्मक प्रक्रिया ही अपनाई जानी चाहिए।
जस्टिस आनंद शर्मा की पीठ ने इस मामले को कानून के दुरुपयोग का उदाहरण बताते हुए कहा कि राज्य ने प्रशासनिक अधिकारों का प्रयोग गलत उद्देश्य से किया जो विधि के विरुद्ध है।
अदालत ने कहा,
“नियम 25ए का उपयोग दिखावे के लिए प्रशासनिक कारणों से किया गया, जबकि वास्तविक उद्देश्य याचिकाकर्ता के कथित कदाचार से निपटना था। यह विधि में दुर्भावना का स्पष्ट मामला है, क्योंकि शक्ति का प्रयोग उसके निर्धारित उद्देश्य से हटकर किया गया।”
मामले में याचिकाकर्ता, जो चीफ मेडिकल ऑफिसर के पद पर तैनात थे, उनको अचानक APO कर दिया गया, जबकि राज्य में तबादलों पर रोक लगी हुई थी। उन्हें उसी दिन कार्यमुक्त कर जयपुर स्थित चिकित्सा एवं स्वास्थ्य निदेशालय में रिपोर्ट करने को कहा गया।
राज्य सरकार ने अपने जवाब में स्वीकार किया कि यह कार्रवाई याचिकाकर्ता के खिलाफ प्राप्त शिकायतों और आरोपों के आधार पर की गई। साथ ही उनके खिलाफ विभागीय जांच प्रस्तावित थी।
हालांकि, याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि ऐसे मामलों में राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1958 के तहत विधिवत अनुशासनात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए, जिसे दरकिनार नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने इस तर्क से सहमति जताते हुए कहा कि राज्य ने निर्धारित कानूनी प्रक्रिया को नजरअंदाज किया, जो स्वीकार्य नहीं है।
अदालत ने विधि में दुर्भावना के सिद्धांत की व्याख्या करते हुए कहा कि इसका मतलब व्यक्तिगत दुर्भावना नहीं बल्कि कानून द्वारा प्रदत्त शक्ति का गलत उद्देश्य के लिए उपयोग है।
सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी प्राधिकारी ने अपने अधिकार का प्रयोग ऐसे उद्देश्य के लिए किया, जो कानून द्वारा निर्धारित नहीं है, तो वह कार्रवाई अवैध मानी जाएगी।
अदालत ने स्पष्ट किया,
“जब कदाचार के आरोप आधार हों तो केवल अनुशासनात्मक नियमों के तहत ही कार्रवाई की जा सकती है। APO का सहारा लेना अनिवार्य प्रक्रिया से बचने के समान है।”
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने APO आदेश रद्द कर दिया।

