गुरुद्वारा प्रबंधन विवाद में हाईकोर्ट का अहम फैसला: धार्मिक आस्था और संपत्ति पर कब्जे के अधिकार को अलग-अलग देखना होगा

LiveLaw Network

12 Aug 2026 7:57 PM IST

  • गुरुद्वारा प्रबंधन विवाद में हाईकोर्ट का अहम फैसला: धार्मिक आस्था और संपत्ति पर कब्जे के अधिकार को अलग-अलग देखना होगा

    राजस्थान हाईकोर्ट ने हनुमानगढ़ जिले के गोलूवाला स्थित गुरुद्वारा मेहताबगढ़ साहिब के प्रबंधन और कब्जे को लेकर चल रहे विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति का लंबे समय तक किसी धार्मिक स्थल से जुड़ा रहना, वहां सेवा करना अथवा प्रबंधन संभालना अपने आप में उस धार्मिक स्थल की जमीन पर मालिकाना हक या अनन्य कब्जे का कानूनी अधिकार नहीं देता। धार्मिक आस्था और संपत्ति पर कानूनी अधिकार दो अलग-अलग विषय हैं।

    जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने हरमीत कौर उर्फ बीबी की ओर से दायर आपराधिक विविध याचिका को खारिज करते हुए उपखंड मजिस्ट्रेट, पीलीबंगा द्वारा 3 अक्टूबर 2025 को गुरुद्वारा परिसर को कुर्क करने और थाना प्रभारी को रिसीवर नियुक्त करने के आदेश तथा अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश क्रम संख्या-2, हनुमानगढ़ के 18 नवंबर 2025 के आदेश को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि मामले की परिस्थितियों में यह कार्रवाई किसी पक्ष को विजेता घोषित करने के लिए नहीं, बल्कि संभावित हिंसा और शांति भंग को रोकने के लिए की गई निवारक कार्रवाई थी।

    हथियारों से लैस भीड़ के गुरुद्वारे में प्रवेश के प्रयास का मामला

    मामला 3 अक्टूबर 2025 की घटना से जुड़ा है। रिकॉर्ड के अनुसार उस समय करीब 50 से 60 लोगों की भीड़ कथित रूप से लाठी, तलवार, गंडासी और भालों जैसे हथियार लेकर गुरुद्वारे के पिछले द्वार तक पहुंची। पुलिसकर्मियों द्वारा रोकने के बावजूद भीड़ के कुछ लोगों द्वारा दीवार पार कर परिसर में प्रवेश का प्रयास करने तथा पुलिसकर्मियों के साथ बल प्रयोग और सरकारी कार्य में बाधा डालने के आरोप लगाए गए।

    इस घटना के संबंध में थाना गोलूवाला में दो अलग-अलग FIR दर्ज हुईं। पहली FIR सहायक उप निरीक्षक विजय सिंह की रिपोर्ट पर और दूसरी FIR याचिकाकर्ता हरमीत कौर की रिपोर्ट पर दर्ज की गई। दोनों FIR एक ही घटना से संबंधित थीं, लेकिन उनमें घटना के अलग-अलग पक्ष सामने आए। अदालत ने माना कि एक ही घटना के संबंध में दो प्रतिस्पर्धी पक्षों की FIR होना विवाद की गंभीरता और संवेदनशीलता को दर्शाता है।

    कई महीनों से क्षेत्र में तनाव का माहौल

    हाईकोर्ट ने कहा कि यह मामला केवल गुरुद्वारे के प्रबंधन को लेकर सामान्य विवाद नहीं था। राज्य की ओर से पेश रिकॉर्ड के अनुसार क्षेत्र में पिछले कई महीनों से तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई थी और पिछले दो-तीन महीनों में लगभग प्रतिदिन विवाद से जुड़ी कोई न कोई घटना सामने आने की बात कही गई।

    अदालत के अनुसार जब धार्मिक स्थल में प्रवेश और नियंत्रण को लेकर प्रतिद्वंद्वी समूहों के बीच बार-बार टकराव हो रहा हो, हथियारों का इस्तेमाल हो रहा हो, पुलिसकर्मियों को रोका जा रहा हो और जबरन प्रवेश के प्रयास हो रहे हों, तो प्रशासन केवल इस आधार पर मूकदर्शक नहीं रह सकता कि किसी एक पक्ष का पहले से परिसर में कब्जा था। निवारक अधिकार क्षेत्र का उद्देश्य ही ऐसी स्थिति में संभावित हिंसा को रोकना है।

    2016 से प्रबंधन संभालने का दावा, लेकिन मालिकाना हक साबित नहीं

    याचिकाकर्ता हरमीत कौर ने अदालत के समक्ष कहा कि वह वर्ष 2016 से गुरुद्वारा मेहताबगढ़ साहिब की मुख्य सेवादार के रूप में कार्य कर रही हैं और गुरुद्वारे के प्रबंधन तथा दैनिक गतिविधियों को देखती रही हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि उनकी नियुक्ति शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) द्वारा की गई थी।

    हालांकि अदालत ने इस दावे के आधार पर गुरुद्वारा परिसर की जमीन पर उनका अथवा एसजीपीसी का स्वामित्व या अनन्य कब्जे का अधिकार स्वीकार नहीं किया।

    अदालत ने कहा कि यदि एसजीपीसी ने किसी व्यक्ति को गुरुद्वारे का प्रबंधन संभालने के लिए नियुक्त किया भी हो, तो इससे अपने आप उस व्यक्ति को उस जमीन का मालिकाना हक प्राप्त नहीं हो जाता। प्रबंधन, स्वामित्व और कानूनी कब्जा अलग-अलग विधिक अवधारणाएं हैं।

    हर गुरुद्वारे का प्रबंधन एसजीपीसी के अधीन होना जरूरी नहीं

    फैसले में हाईकोर्ट ने गुरुद्वारों के प्रबंधन से जुड़े एक महत्वपूर्ण पहलू पर भी चर्चा की। अदालत ने यह जानना चाहा कि क्या राजस्थान में कोई ऐसा कानून, नियम, स्थापित परंपरा या प्रथा है जिसके तहत प्रत्येक गुरुद्वारे का प्रबंधन अनिवार्य रूप से एसजीपीसी द्वारा गठित समिति के माध्यम से ही किया जाना आवश्यक है।

    इस संबंध में अदालत के समक्ष कोई ऐसा वैधानिक प्रावधान या स्थापित परंपरा प्रस्तुत नहीं की जा सकी। अदालत ने अपने समक्ष उपस्थित सिख समुदाय से जुड़े अधिवक्ताओं से भी इस विषय में सहायता ली। अधिवक्ताओं ने बताया कि सामान्यतः कई स्थानों पर गुरुद्वारे स्थानीय श्रद्धालुओं और सिख समुदाय के लोगों के सहयोग से स्थापित होते हैं और उनका दैनिक प्रबंधन स्थानीय समिति द्वारा किया जाता है।

    हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई सार्वभौमिक नियम सामने नहीं आया जिससे यह माना जाए कि प्रत्येक गुरुद्वारे का प्रबंधन अनिवार्य रूप से एसजीपीसी के नियंत्रण में होना चाहिए।

    धार्मिक स्थल निजी संपत्ति से अलग प्रकृति का होता है

    फैसले का एक महत्वपूर्ण हिस्सा धार्मिक स्थलों में प्रवेश के अधिकार को लेकर है। अदालत ने कहा कि निजी संपत्ति और धार्मिक स्थल के संबंध में कब्जे और प्रवेश के सिद्धांतों को एक समान तरीके से लागू नहीं किया जा सकता।

    निजी संपत्ति में सामान्यतः मालिक की अनुमति के बिना किसी तीसरे व्यक्ति के प्रवेश का प्रश्न अलग तरीके से देखा जाता है। लेकिन धार्मिक स्थल अपने स्वभाव से श्रद्धालुओं के लिए होता है। निर्धारित समय या कानूनन लागू समान प्रतिबंधों को छोड़कर किसी धार्मिक स्थल की प्रकृति सामान्य पहुंच की ओर संकेत करती है।

    अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को केवल इस आधार पर धार्मिक स्थल में प्रवेश से रोकने का दावा नहीं किया जा सकता कि वह किसी दूसरे धर्म, आस्था या संप्रदाय से संबंधित है अथवा उसने किसी विशेष व्यक्ति से व्यक्तिगत अनुमति नहीं ली है।

    “आस्था पवित्र है, लेकिन कब्जा कानून का विषय है”

    फैसले में अदालत ने धार्मिक आस्था और संपत्ति के अधिकार के बीच अंतर को प्रभावी ढंग से रेखांकित किया। अदालत ने कहा कि गुरुद्वारा केवल जमीन या भवन नहीं है, बल्कि वह धार्मिक आस्था और आध्यात्मिक गतिविधियों का केंद्र है। गुरु ग्रंथ साहिब की पवित्र उपस्थिति, दर्शन, पाठ, कीर्तन, अरदास, सेवा और लंगर जैसी गतिविधियां उसके धार्मिक स्वरूप को निर्धारित करती हैं।

    अदालत ने कहा कि कोई व्यक्ति यदि दशकों तक किसी गुरुद्वारे में आता-जाता रहा हो, वहां सेवा करता रहा हो या लंबे समय तक उसके प्रबंधन से जुड़ा रहा हो, तो इससे उसकी धार्मिक आस्था और संस्थान से जुड़ाव तो प्रदर्शित हो सकता है, लेकिन इससे अपने आप जमीन पर मालिकाना हक या अनन्य कब्जे का अधिकार पैदा नहीं होता।

    अर्थात आस्था को संपत्ति के स्वामित्व या विशेष कब्जे के कानूनी अधिकार में परिवर्तित नहीं किया जा सकता।

    धारा 164 और 165 बीएनएसएस का दायरा समझाया

    हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 164 और 165 के तहत कार्यवाही की प्रकृति पर भी विस्तार से चर्चा की। अदालत ने कहा कि इन धाराओं के तहत कार्यवाही का उद्देश्य संपत्ति के स्वामित्व का अंतिम फैसला करना नहीं, बल्कि ऐसी स्थिति में शांति बनाए रखना है जहां जमीन या संपत्ति को लेकर विवाद से शांति भंग होने की आशंका हो।

    अदालत के अनुसार ऐसी कार्यवाही शुरू करने के लिए केवल अस्पष्ट या सामान्य आरोप पर्याप्त नहीं हैं। संभावित शांति भंग या सार्वजनिक शांति एवं व्यवस्था के लिए तत्काल खतरे को विश्वसनीय और ठोस सामग्री से प्रदर्शित किया जाना चाहिए।

    रिसीवर नियुक्ति को हाईकोर्ट ने परिस्थितियों में उचित माना

    याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क दिया गया था कि जब वह पहले से गुरुद्वारे का प्रबंधन और कब्जा संभाल रही थीं, तो प्रशासन उन्हें हटाकर रिसीवर नियुक्त नहीं कर सकता था।

    हाईकोर्ट ने कहा कि सामान्य स्थिति में निवारक कार्यवाही को किसी पक्ष के स्वामित्व या अधिकार का अंतिम निर्धारण करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। लेकिन वर्तमान मामले में स्थिति सामान्य नहीं थी। रिकॉर्ड में प्रतिद्वंद्वी समूहों के बीच लगातार टकराव, जबरन प्रवेश के प्रयास, हथियारों का इस्तेमाल, शारीरिक झड़प और पुलिस के साथ कथित दुर्व्यवहार जैसे तथ्य सामने आए।

    ऐसी स्थिति में प्रशासन का उद्देश्य किसी पक्ष को अधिकार देना नहीं बल्कि दोनों पक्षों के बीच टकराव को रोकना था। अदालत ने कहा कि निवारक कार्रवाई का उद्देश्य विजेता घोषित करना नहीं, बल्कि शांति बनाए रखना है।

    पुलिस को वर्तमान स्थिति का नए सिरे से आकलन करने के निर्देश

    हाईकोर्ट ने वर्तमान थाना प्रभारी को क्षेत्र की कानून-व्यवस्था की स्थिति का नए सिरे से आकलन कर रिपोर्ट पुलिस अधीक्षक, हनुमानगढ़ को देने का निर्देश दिया। पुलिस अधीक्षक को भी वर्तमान परिस्थितियों, शांति भंग की संभावना और आवश्यक कदमों के संबंध में रिपोर्ट प्राप्त कर उसका परीक्षण करने तथा सक्षम अधिकारी के समक्ष रखने के निर्देश दिए गए।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वर्तमान थाना प्रभारी के विरुद्ध कोई आरोप नहीं है और वह निष्पक्ष एवं स्वतंत्र रूप से कानून के अनुसार कार्रवाई करेंगी।

    मालिकाना हक पर अंतिम फैसला नहीं

    हाईकोर्ट ने विशेष रूप से स्पष्ट किया कि इस निर्णय से गुरुद्वारे अथवा उससे जुड़ी जमीन के स्वामित्व, स्थायी प्रबंधन या किसी व्यक्ति अथवा संस्था के अंतिम अधिकार का फैसला नहीं हुआ है।

    अदालत ने कहा कि यदि किसी पक्ष के पास स्वामित्व अथवा स्थायी प्रबंधन से संबंधित कोई वास्तविक अधिकार है तो वह सक्षम न्यायालय या प्राधिकरण के समक्ष कानून के अनुसार अपना दावा प्रस्तुत कर सकता है। वर्तमान फैसला केवल निवारक कार्यवाही और शांति बनाए रखने के सीमित प्रश्न तक है।

    याचिका खारिज, एसडीएम और सत्र न्यायालय के आदेश बरकरार

    हाईकोर्ट ने अंततः माना कि परिस्थितियों को देखते हुए 3 अक्टूबर 2025 को गुरुद्वारा परिसर को कुर्क करने और रिसीवर नियुक्त करने की कार्रवाई मनमानी, अवैध या अधिकार क्षेत्र से बाहर नहीं थी। अदालत ने कहा कि यह कार्रवाई तत्काल और वास्तविक आवश्यकता को देखते हुए आगे के टकराव को रोकने तथा सार्वजनिक शांति बनाए रखने के लिए की गई थी।

    इसके साथ ही हाईकोर्ट ने हरमीत कौर की याचिका खारिज कर दी तथा 3 अक्टूबर 2025 के एसडीएम, पीलीबंगा के आदेश और 18 नवंबर 2025 के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश क्रम संख्या-2, हनुमानगढ़ के आदेश को बरकरार रखा। हालांकि अदालत ने दोहराया कि यह निर्णय गुरुद्वारे या जमीन के स्वामित्व अथवा स्थायी प्रबंधन अधिकार का अंतिम निर्धारण नहीं है और संबंधित पक्ष अपने वास्तविक अधिकारों के लिए सक्षम न्यायिक मंच के समक्ष जा सकते हैं।

    केस टाइटल:हरमीत कौर @ बीबी बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य

    रजाक खान हैदर @ लाइव लॉ नेटवर्क

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