अवैध तलाशी से PC-PNDT Act की शिकायत अपने आप रद्द नहीं होगी: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट
Amir Ahmad
18 Sept 2026 1:24 PM IST

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि यदि प्री-कन्सेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक्स (लिंग चयन निषेध) अधिनियम 1994 के तहत किसी केंद्र की तलाशी की अनुमति देने में प्रक्रिया संबंधी खामी रही हो तो केवल इस आधार पर आपराधिक शिकायत रद्द नहीं की जा सकती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तलाशी की वैधता और तलाशी के दौरान मिले साक्ष्यों की प्रासंगिकता व स्वीकार्यता अलग-अलग प्रश्न हैं।
जस्टिस मनीषा बत्रा ने दो याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि यदि शिकायत में ऐसे विशिष्ट आरोप हैं, जो साबित होने पर संबंधित कानून के तहत अपराध बन सकते हैं, तो धारा 482 के तहत कार्यवाही को शुरुआती स्तर पर समाप्त नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि कथित कमियां वास्तव में साबित हुईं या नहीं, तलाशी के दौरान दर्ज परिस्थितियां सही थीं या नहीं और किसी चूक के पीछे जानबूझकर किया गया कृत्य था या अनजाने में हुई गलती—ये सभी सवाल साक्ष्य के आधार पर ट्रायल में तय किए जाने हैं।
मामला बहादुरगढ़ स्थित श्री बालाजी इमेजिंग एंड पैथोलॉजी सेंटर प्राइवेट लिमिटेड में 20 जनवरी 2014 को की गई औचक जांच से जुड़ा है। केंद्र PC-PNDT Act के तहत अल्ट्रासाउंड जांच के लिए पंजीकृत था। जांच टीम का नेतृत्व नोडल अधिकारी ने किया। निरीक्षण के दौरान केंद्र की निदेशक रेणु देशवाल मौजूद थीं, जबकि डॉ. महेश चंदर मिश्रा अनुपस्थित थे।
जांच टीम के अनुसार, मशीन में 479 अल्ट्रासाउंड दर्ज थे लेकिन केंद्र की ओर से दो साल के आवश्यक रिकॉर्ड पेश नहीं किए गए। इसके अलावा रजिस्टर और 40 फॉर्म-एफ व रेफरल स्लिप में कई कमियां पाई गईं। इनमें हस्ताक्षरों का अभाव, मरीज और उसके पति से जुड़ी अधूरी जानकारी, पन्नों पर क्रमांक न होना और कुछ ऐसी रिपोर्ट शामिल थीं, जिन पर डॉ. मिश्रा के हस्ताक्षर थे, जबकि कथित तौर पर अल्ट्रासाउंड डॉ. विनीत गुप्ता ने किए।
इसके बाद केंद्र का पंजीकरण निलंबित कर दिया गया और अधिनियम की धारा 28 के तहत शिकायत दर्ज की गई। पहले जारी समन आदेश को पुनरीक्षण अदालत ने पर्याप्त कारण दर्ज नहीं होने के चलते रद्द कर मामला वापस भेज दिया। इसके बाद 19 मार्च 2021 को नया समन आदेश जारी किया गया, जिसे याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि शिकायत डिप्टी सिविल सर्जन-सह-नोडल अधिकारी ने दाखिल की थी, लेकिन तीन सदस्यीय जिला उपयुक्त प्राधिकारी से उनकी वैध अनुमति का कोई प्रमाण नहीं है। इसके लिए डॉ. अनिल बंसल बनाम जिला उपयुक्त प्राधिकारी, गुरुग्राम मामले में हाईकोर्ट के फैसले का हवाला दिया गया।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि तलाशी कथित “गुप्त सूचना” के आधार पर की गई, लेकिन जिला उपयुक्त प्राधिकारी के तीनों सदस्यों की सामूहिक अनुमति का कोई रिकॉर्ड नहीं था। इसलिए धारा 30 के तहत तलाशी को अवैध बताते हुए कहा गया कि तलाशी में मिले अल्ट्रासाउंड रिकॉर्ड और फॉर्म-एफ समेत सभी सामग्री के आधार पर अभियोजन नहीं चलाया जा सकता।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि तलाशी के दौरान स्वतंत्र गवाहों को शामिल नहीं किया गया। डॉ. विनीत गुप्ता की ओर से यह दलील दी गई कि उन्होंने 31 अक्टूबर 2013 को केंद्र से इस्तीफा दे दिया, जबकि जांच 20 जनवरी 2014 को हुई। इसलिए बाद में सामने आई कथित कमियों के लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
राज्य सरकार ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि अभियोजन चलाने के मुद्दे पर जिला सलाहकार समिति और तीन सदस्यीय जिला उपयुक्त प्राधिकारी ने विचार-विमर्श किया। इसके बाद प्राधिकारी ने डॉ. राज करण को शिकायत दर्ज करने के लिए अधिकृत किया। राज्य ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के उन फैसलों का हवाला दिया, जिनमें उपयुक्त प्राधिकारी द्वारा अधिकृत अधिकारी को शिकायत दाखिल करने की अनुमति दी गई।
राज्य ने सुप्रीम कोर्ट के डॉ. नरेश कुमार गर्ग बनाम हरियाणा राज्य के 2026 के फैसले पर भी भरोसा किया। इसमें तलाशी की वैधता और तलाशी के दौरान जुटाई गई सामग्री की स्वीकार्यता को अलग-अलग प्रश्न माना गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 28(1)(ए) उपयुक्त प्राधिकारी द्वारा अधिकृत अधिकारी को शिकायत दाखिल करने की स्पष्ट अनुमति देती है। इसलिए यह देखना महत्वपूर्ण है कि शिकायतकर्ता को वैध रूप से अधिकृत किया गया या नहीं, न कि केवल यह कि शिकायत पर तीनों सदस्यों के हस्ताक्षर थे या नहीं।
कोर्ट ने कहा कि राज्य ने हलफनामे में स्पष्ट रूप से बताया कि जिला उपयुक्त प्राधिकारी ने मामले पर विचार-विमर्श के बाद डॉ. राज करण को शिकायत दर्ज करने के लिए अधिकृत किया। याचिकाकर्ता इस दावे का खंडन करने वाला कोई ठोस दस्तावेज पेश नहीं कर सके। ऐसे में केवल अनुमान के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि शिकायतकर्ता के पास अधिकार नहीं था।
तलाशी की प्रक्रिया पर हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के रविंदर कुमार बनाम हरियाणा राज्य फैसले का उल्लेख करते हुए माना कि यदि बहु-सदस्यीय उपयुक्त प्राधिकारी के किसी एक सदस्य ने सामूहिक निर्णय के बिना धारा 30 के तहत तलाशी अधिकृत की हो तो ऐसी तलाशी अवैध हो सकती है। लेकिन बाद के डॉ. नरेश कुमार गर्ग फैसले के आधार पर कोर्ट ने कहा कि तलाशी में हुई ऐसी अवैधता अपने आप शिकायत या उससे जुटाई गई सामग्री को समाप्त नहीं कर देती।
अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने तलाशी की वैधता और तलाशी के दौरान जुटाई गई सामग्री की प्रासंगिकता तथा स्वीकार्यता के बीच स्पष्ट अंतर किया। केवल तलाशी अवैध होने से उसके दौरान मिली सामग्री को स्वत: अस्तित्वहीन नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि मौजूदा मामले में अभियोजन का आधार केवल परिसर में की गई तलाशी नहीं है, बल्कि कानून के तहत अनिवार्य रिकॉर्ड के रखरखाव में कथित कमियां भी हैं। रजिस्टर, फॉर्म-एफ और रेफरल स्लिप से संबंधित कई विशिष्ट आरोप शिकायत में लगाए गए। इसके अलावा उपयुक्त प्राधिकारी ने बाद में अभियोजन चलाने के मामले पर विचार कर शिकायत दर्ज करने की अनुमति भी दी थी।
स्वतंत्र गवाहों को शामिल नहीं किए जाने की दलील पर कोर्ट ने अप्पाभाई बनाम गुजरात राज्य के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यदि स्थानीय लोगों से गवाह बनने का अनुरोध किया गया लेकिन उन्होंने मना कर दिया, तो केवल इस आधार पर अभियोजन का मामला खत्म नहीं हो जाता। इसका प्रभाव साक्ष्यों के मूल्यांकन के दौरान देखा जा सकता है।
हाईकोर्ट ने फेडरेशन ऑफ ऑब्स्टेट्रिक्स एंड ग्यानाकोलॉजिकल सोसायटीज ऑफ इंडिया बनाम भारत संघ के फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें फॉर्म-एफ का पूर्ण रूप से पालन अनिवार्य माना गया था। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में फॉर्म-एफ के अधूरे या बिना हस्ताक्षर वाले होने तथा रजिस्टर में अन्य कमियों के संबंध में लगाए गए विशिष्ट आरोप प्रथम दृष्टया अपराध का आधार बनते हैं।
अदालत ने यह भी कहा कि 11 दिसंबर 2013 को हुई पिछली जांच में केंद्र के कामकाज को संतोषजनक पाए जाने से बाद की कथित अनियमितताओं से कोई छूट नहीं मिलती। एक तारीख को नियमों का पालन किया जाना इस बात की गारंटी नहीं है कि बाद की तारीख में उल्लंघन नहीं हुआ होगा। 20 जनवरी 2014 को दर्ज परिस्थितियां सही थीं या नहीं, यह ट्रायल में साक्ष्यों के आधार पर तय होगा।
डॉ. विनीत गुप्ता के इस्तीफे की दलील पर भी हाईकोर्ट ने अंतिम निष्कर्ष देने से इनकार किया। राज्य ने ऐसे अल्ट्रासाउंड रिकॉर्ड का हवाला दिया, जो कथित इस्तीफे के बाद के थे और जिनमें प्रक्रियाएं डॉ. गुप्ता द्वारा किए जाने का आरोप है, जबकि रिपोर्ट पर डॉ. मिश्रा के हस्ताक्षर थे। कोर्ट ने कहा कि यह तथ्यात्मक विवाद है, जिसे धारा 482 की कार्यवाही में तय नहीं किया जा सकता। अधिनियम की धारा 23 के तहत केंद्र में पेशेवर या तकनीकी सेवाएं देने वाले व्यक्ति की जिम्मेदारी भी विचारणीय हो सकती है।
हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि आरोपों को प्रथम दृष्टया सही मानने पर वे इतने असंगत या स्वाभाविक रूप से असंभव नहीं हैं कि आपराधिक शिकायत को शुरुआती चरण में ही रद्द कर दिया जाए। कोर्ट ने कहा कि PC-PNDT Act की व्यवस्था में उपयुक्त प्राधिकारी, सलाहकार समिति, अभियोजन और रिकॉर्ड रखने से जुड़े प्रावधान महत्वपूर्ण हैं और तलाशी की प्रक्रिया में कथित खामी के सिद्धांत को इतना व्यापक नहीं किया जा सकता कि पूरी वैधानिक व्यवस्था ही कमजोर हो जाए।

