प्रतिकूल आदेश ट्रायल स्थानांतरण का आधार नहीं, फोरम हंटिंग पर लगाम जरूरी: पंजाब एंड हरियाणा हाइकोर्ट

Amir Ahmad

2 Feb 2026 4:57 PM IST

  • प्रतिकूल आदेश ट्रायल स्थानांतरण का आधार नहीं, फोरम हंटिंग पर लगाम जरूरी: पंजाब एंड हरियाणा हाइकोर्ट

    पंजाब एंड हरियाणा हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी मामले में प्रतिकूल आदेश पारित होना या ऐसा आदेश जो बाद में उच्च अदालत द्वारा निरस्त कर दिया जाए, अपने आप में न्यायिक पक्षपात या पूर्वाग्रह का आधार नहीं बन सकता। हाइकोर्ट ने कहा कि न्यायिक त्रुटि और न्यायिक पक्षपात को एक समान नहीं माना जा सकता और केवल मनचाहा आदेश न मिलने के आधार पर ट्रायल के स्थानांतरण की मांग करना न्यायिक प्रक्रिया की स्थिरता के लिए गंभीर खतरा है।

    जस्टिस सुमीत गोयल ने कहा कि अक्सर वादी या आरोपी किसी प्रतिकूल आदेश को जज की कथित पक्षधरता के रूप में देख लेते हैं, जिससे निराधार स्थानांतरण याचिकाओं की बाढ़ आ जाती है। उन्होंने कहा कि ट्रायल जज का कर्तव्य है कि वह कानून के अनुसार अपने दायित्व का निर्वहन करे और इस आशंका से ग्रस्त न हो कि उस पर पक्षपात के आरोप लगाए जाएंगे। केवल आरोपों के दबाव में किसी न्यायिक अधिकारी से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह स्वयं को मामले से अलग कर ले।

    हाइकोर्ट ने यह भी कहा कि न्यायिक अधिकारी अक्सर अत्यधिक दबाव और तनावपूर्ण परिस्थितियों में कार्य करते हैं। ऐसे में यदि उनसे कोई त्रुटि हो भी जाती है, तो उसके सुधार के लिए कानून में पर्याप्त उपाय उपलब्ध हैं। लेकिन किसी पक्ष को नापसंद आदेश के आधार पर न्यायिक कार्यप्रणाली पर सवाल उठाना और इसी बहाने ट्रायल के स्थानांतरण की मांग करना एक प्रकार की चालबाजी है, जिसे स्वीकार किया गया तो न्यायिक व्यवस्था में अराजकता फैल जाएगी।

    जस्टिस गोयल ने फोरम हंटिंग की प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि यदि पक्षकारों को यह छूट दे दी जाए कि वे अपनी सुविधा या पसंद के अनुसार अदालत बदलते रहें, तो वे कभी भी किसी एक अदालत में ट्रायल का सामना नहीं करेंगे। ऐसी प्रवृत्ति को सख्ती से रोका जाना आवश्यक है, क्योंकि इससे न्यायिक अधिकारियों को डराने और दबाव में लेने की कोशिश की जाती है।

    हाइकोर्ट ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग के लिए दायर की जाने वाली निरर्थक और दुर्भावनापूर्ण याचिकाएं अदालतों की गरिमा को ठेस पहुंचाती हैं। यदि ऐसे प्रयासों का दृढ़ता से सामना नहीं किया गया तो न्याय व्यवस्था की पवित्रता गंभीर रूप से प्रभावित होगी। कोर्ट ने कहा कि कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग करने वाले पक्षकारों को इसके परिणामों के प्रति किसी भ्रम में नहीं रहना चाहिए। ऐसे मामलों में उदाहरणात्मक लागत लगाना न केवल उचित बल्कि आवश्यक है, ताकि दूसरों को भी इस तरह की कोशिशों से रोका जा सके।

    हाइकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रायल के स्थानांतरण की मांग करने वाले पक्ष को यह साबित करने की आवश्यकता नहीं है कि यदि मामला स्थानांतरित नहीं हुआ तो न्याय निश्चित रूप से विफल हो जाएगा। हालांकि, केवल मन में उपजी आशंका या काल्पनिक भय स्थानांतरण का आधार नहीं बन सकता। ऐसी आशंका तर्कसंगत होनी चाहिए और उसे ठोस सामग्री से समर्थित किया जाना आवश्यक है।

    कोर्ट ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 408 और 407 (अब BNSS के समकक्ष प्रावधान) यह स्पष्ट करती हैं कि स्थानांतरण याचिका के साथ शपथपत्र दाखिल करना अनिवार्य है और निरर्थक याचिकाओं पर लागत लगाए जाने का प्रावधान भी इसी उद्देश्य से किया गया, ताकि स्थानांतरण की शक्ति को फोरम शॉपिंग के औजार के रूप में इस्तेमाल न किया जा सके।

    मामले की पृष्ठभूमि में याचिकाकर्ता ने BNSS, 2023 की धारा 528 सहपठित धारा 447 के तहत हाइकोर्ट का रुख किया। उसने सत्र अदालत के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें मानहानि के एक आपराधिक मामले को स्थानांतरित करने की उसकी मांग खारिज कर दी गई। यह शिकायत वर्ष 2019 में एक दवा व्यवसायी और रोटरी इंटरनेशनल के पूर्व जिला गवर्नर द्वारा दायर की गई, जिसमें आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता ने झूठे और मानहानिकारक संदेश प्रसारित कर उनकी छवि को नुकसान पहुंचाया।

    याचिकाकर्ता ने सत्र अदालत में यह दलील दी थी कि उसकी उम्र लगभग 88–89 वर्ष है, वह गंभीर बीमारियों से पीड़ित है और देहरादून से पंचकूला आकर पेशी देना उसके लिए कठिन है। साथ ही ट्रायल कोर्ट और शिकायतकर्ता के बीच मिलीभगत और मजिस्ट्रेट द्वारा दोषसिद्धि का आश्वासन दिए जाने जैसे आरोप भी लगाए गए।

    हाइकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता अपने आरोपों के समर्थन में कोई ठोस सामग्री प्रस्तुत नहीं कर सका। मजिस्ट्रेट और विरोधी पक्ष के वकील पर लगाए गए आरोप सामान्य, निराधार और निंदनीय पाए गए। कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल इस आधार पर कि मामला वर्ष 2019 से लंबित है, ट्रायल का स्थानांतरण नहीं किया जा सकता।

    इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाइकोर्ट ने स्थानांतरण याचिका खारिज की और याचिकाकर्ता पर 50,000 रुपये की लागत भी लगाई। कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया कि न्यायिक प्रक्रिया को बाधित करने और फोरम हंटिंग जैसी प्रवृत्तियों को किसी भी कीमत पर बढ़ावा नहीं दिया जा सकता।

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