कोर्ट की गलती से पुलिस अधिकारी पर लगा जुर्माना, पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने आदेश वापस लिया
Amir Ahmad
14 Sept 2026 12:21 PM IST

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने अपने ही पुराने आदेश में हुई तथ्यात्मक गलती को सुधारते हुए मेवात के पुलिस अधीक्षक पर लगाए गए 5 हजार रुपये के जुर्माने का आदेश वापस ले लिया। कोर्ट ने माना कि 7 सितंबर को जुर्माना लगाते समय यह तथ्य सही ढंग से दर्ज नहीं हो पाया कि राज्य सरकार की ओर से जवाब उसी दिन अदालत में पेश करने का प्रयास किया गया।
जस्टिस सुमीत गोयल ने मामले में अदालत की गलती से किसी पक्ष को नुकसान न होने के सिद्धांत को लागू करते हुए कहा कि अदालत की अपनी भूल के कारण किसी व्यक्ति को नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता। कोर्ट ने इस संबंध में 'एक्टस क्यूरिए नेमिनेम ग्रेवाबिट' के सिद्धांत का उल्लेख किया, जिसका अर्थ है कि अदालत का कोई कार्य किसी के लिए नुकसान का कारण नहीं बनना चाहिए।
मामले में 18 अगस्त 2026 को हाईकोर्ट ने राज्य के वकील को अगली सुनवाई से पहले याचिकाकर्ता के वकील को जवाब की अग्रिम प्रति देने का निर्देश दिया। ऐसा नहीं करने पर मेवात के पुलिस अधीक्षक पर 25 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाए जाने की बात कही गई।
7 सितंबर को जब जवाब अदालत के समक्ष पेश नहीं हुआ तो राज्य की ओर से जवाब को देरी से रिकॉर्ड पर लेने का अनुरोध किया गया। हाईकोर्ट ने उस समय अनुरोध स्वीकार नहीं किया और पुलिस अधीक्षक पर 5 हजार रुपये का जुर्माना लगा दिया। साथ ही अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (कानून एवं व्यवस्था) को यह राशि उनके वेतन से काटकर हरियाणा राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण में जमा कराने का निर्देश दिया गया।
बाद में अदालत के कर्मचारियों की ओर से यह तथ्य सामने लाया गया कि 7 सितंबर को राज्य सरकार ने जवाब रिकॉर्ड पर रखने का प्रयास किया। यानी जिस आधार पर पुलिस अधीक्षक पर जुर्माना लगाया गया उसमें तथ्यात्मक त्रुटि रह गई।
जस्टिस सुमीत गोयल ने इस गलती को सुधारने के लिए 'नन्स प्रो टंक' के सिद्धांत का भी सहारा लिया। इसका आशय है कि अदालत अपने पुराने आदेश में हुई स्पष्ट गलती को बाद के आदेश के जरिए ठीक कर सकती है।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के जंग सिंह बनाम बृज लाल, बुधिया स्वैन बनाम गोपीनाथ देब, भूपिंदर सिंह बनाम यूनिटेक लिमिटेड और ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण बनाम प्रभजीत सिंह सोनी मामलों में दिए गए फैसलों का भी उल्लेख किया।
कोर्ट ने कहा कि जब किसी पक्ष को अदालत की अपनी गलती के कारण नुकसान होता है तो उसे उस स्थिति में वापस लाना अदालत का दायित्व है, जिसमें वह गलती न होने पर होता। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में आदेश वापस लेने की शक्ति का इस्तेमाल सीमित परिस्थितियों में ही किया जा सकता है और गलती ऐसी होनी चाहिए जो स्पष्ट हो तथा जिसे साबित करने के लिए लंबी प्रक्रिया या विस्तृत तर्क की जरूरत न पड़े।
इन तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने 7 सितंबर 2026 को मेवात के पुलिस अधीक्षक पर लगाए गए 5 हजार रुपये के जुर्माने और वेतन से राशि काटने के निर्देश को वापस ले लिया। कोर्ट ने कहा कि नया आदेश रिकॉर्ड का हिस्सा रहेगा और 7 सितंबर के आदेश के साथ पढ़ा जाएगा। आवेदन का इसी के साथ निपटारा कर दिया गया।


