सिर्फ लंबी हिरासत दूसरी जमानत का आधार नहीं: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका

  • सिर्फ लंबी हिरासत दूसरी जमानत का आधार नहीं: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका

    पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने नशीले पदार्थों के एक मामले में आरोपी की दूसरी नियमित जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि केवल लंबे समय तक हिरासत में रहना, बिना किसी नई या महत्वपूर्ण परिस्थिति के, पहले जमानत आवेदन को दोबारा विचार के लिए खोलने का पर्याप्त आधार नहीं है।

    जस्टिस सुमीत गोयल ने कहा कि जब तथ्यों या कानून की स्थिति में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं हुआ हो, तब केवल लगातार हिरासत में रहने से आरोपी को नियमित जमानत का अधिकार अपने आप नहीं मिल जाता।

    मामला नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के अमृतसर मामले से जुड़ा है। दिसंबर 2024 में दर्ज मामले में आरोपी के खिलाफ स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम की धारा 8, 22, 29, 61 और 85 के तहत कार्रवाई की गई।

    मामले में अल्प्राजोलम, ट्रामाडोल और जोल्पिडेम टार्ट्रेट वाली कुल 1,37,11,610 गोलियां बरामद होने का आरोप है। गोलियों और उनके पैकेटों का कुल वजन करीब 5,772 किलोग्राम बताया गया। बरामदगी वाणिज्यिक मात्रा की श्रेणी में आती है।

    आरोपी की पहली नियमित जमानत याचिका हाईकोर्ट ने 11 फरवरी 2026 को आठ संबंधित मामलों के साथ गुण-दोष के आधार पर खारिज की थी। इसके बाद आरोपी ने इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की, जिसे 29 मई 2026 को वापस लिए जाने के आधार पर खारिज किया गया।

    दूसरी जमानत याचिका में आरोपी की ओर से कहा गया कि वह 3 जनवरी 2025 से हिरासत में है और अब तक मुकदमे की कार्यवाही आगे नहीं बढ़ी है।

    अभियोजन पक्ष का कोई गवाह भी अदालत में पेश नहीं हुआ है। यह भी दलील दी गई कि आरोपी को सह-आरोपी के बयान के आधार पर मामले में जोड़ा गया, जबकि ऐसा बयान अपने आप में स्वीकार्य साक्ष्य नहीं है।

    आरोपी की ओर से यह भी कहा गया कि कंपनी से संबंधित पूरा रिकॉर्ड जांच एजेंसी को सौंपा जा चुका है और शिकायत भी दाखिल हो चुकी है।

    नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि मामले में बरामदगी बहुत बड़ी वाणिज्यिक मात्रा की है और स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम की धारा 37 के तहत जमानत देने पर कड़ी पाबंदी है।

    जांच एजेंसी ने यह भी आशंका जताई कि रिहा किए जाने पर आरोपी फरार हो सकता है या गवाहों को प्रभावित कर सकता है।

    हाईकोर्ट ने अपने पहले के फैसले रफीक खान बनाम हरियाणा राज्य का हवाला देते हुए कहा कि दूसरी या लगातार दायर की जाने वाली जमानत याचिका पर कानूनन विचार किया जा सकता है।

    हालांकि, ऐसी याचिका में आरोपी को परिस्थितियों में कोई महत्वपूर्ण बदलाव दिखाना होगा। केवल ऊपर-ऊपर या दिखावटी बदलाव इसके लिए पर्याप्त नहीं है।

    अदालत ने पाया कि मौजूदा याचिका में पहले जमानत आवेदन की तुलना में कोई महत्वपूर्ण नया तथ्य सामने नहीं आया। आरोपी की ओर से उठाए गए अधिकांश आधार पहली जमानत याचिका पर विचार के समय भी उपलब्ध थे।

    अदालत के अनुसार, पहली जमानत याचिका खारिज होने के बाद आरोपी की हिरासत में करीब साढ़े सात महीने की और वृद्धि ही एकमात्र नया तथ्य था। लेकिन बरामद मादक पदार्थों की प्रकृति और भारी मात्रा को देखते हुए केवल इतनी अतिरिक्त हिरासत को जमानत पर नए सिरे से विचार करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

    हाईकोर्ट ने कहा कि नए हालात इतने महत्वपूर्ण होने चाहिए कि अदालत को अपने पहले के निष्कर्ष पर दोबारा विचार करने और अलग दृष्टिकोण अपनाने के लिए मजबूर करें। इस मामले में ऐसी कोई नई या बाद में पैदा हुई परिस्थिति सामने नहीं आई।

    इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने दूसरी नियमित जमानत याचिका खारिज की। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि उसके द्वारा की गई टिप्पणियों को मामले के अंतिम गुण-दोष पर कोई राय नहीं माना जाएगा।

    अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Next Story