सरकारी नौकरी का झांसा देकर बेरोजगार युवाओं से ठगी गंभीर अपराध, समझौते से आरोप कम नहीं होते: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट
Amir Ahmad
12 May 2026 11:39 AM IST

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने सरकारी नौकरी दिलाने के नाम पर बेरोजगार युवाओं से ठगी के मामले में अग्रिम जमानत देने से इनकार करते हुए कहा कि इस तरह के अपराध समाज पर गंभीर प्रभाव डालते हैं और संस्थागत प्रक्रियाओं में लोगों का भरोसा कमजोर करते हैं।
जस्टिस सुमीत गोयल ने कहा कि,
“फर्जी नियुक्ति पत्रों और सरकारी नौकरी के झूठे आश्वासनों के जरिए बेरोजगार युवाओं का शोषण करना गंभीर अपराध है। केवल पक्षों के बीच समझौता हो जाने या कुछ रकम लौटाने का दावा करने से आरोपों की गंभीरता कम नहीं हो जाती।”
अदालत ने कहा कि जांच के दौरान जुटाई गई सामग्री प्रथम दृष्टया यह दिखाती है कि याचिकाकर्ताओं ने शिकायतकर्ता को झांसा देकर पैसे लेने में सक्रिय भूमिका निभाई।
अभियोजन के अनुसार आरोपियों ने वायुसेना, सेना और सैन्य इंजीनियरिंग सेवा में सरकारी नौकरी दिलाने का झूठा वादा किया।
आरोप है कि उन्होंने खुद को प्रभावशाली संपर्कों वाला व्यक्ति बताकर शिकायतकर्ता से पहले साढ़े सात लाख रुपये और बाद में कुल मिलाकर लगभग 28 लाख रुपये ले लिए।
शिकायतकर्ता को कथित तौर पर फर्जी नियुक्ति पत्र भी दिए गए और प्रशिक्षण के बहाने चंडीगढ़ बुलाया गया, जहां वह करीब तीन महीने तक रहा और अतिरिक्त खर्च भी उठाया।
बाद में पता चला कि संबंधित विभागों में ऐसी कोई भर्ती प्रक्रिया चल ही नहीं रही थी और सभी दस्तावेज फर्जी थे।
राज्य सरकार ने अग्रिम जमानत याचिका का विरोध करते हुए कहा कि यह लगातार दायर की गई जमानत याचिका है और परिस्थितियों में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है।
सरकार ने यह भी कहा कि मामला केवल निजी विवाद नहीं बल्कि बेरोजगार युवाओं को निशाना बनाकर रची गई सुनियोजित साजिश का है।
वहीं याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि वे खुद मुख्य आरोपी के झांसे में आए और शिकायतकर्ता के साथ समझौता भी हो चुका है। उन्होंने जांच में सहयोग करने की बात भी कही।
इन दलीलों को खारिज करते हुए हाइकोर्ट ने कहा कि लगातार अग्रिम जमानत याचिकाएं तभी स्वीकार की जा सकती हैं, जब परिस्थितियों में कोई ठोस बदलाव हो।
अदालत ने माना कि मौजूदा मामले में समझौता ऐसा बदलाव नहीं माना जा सकता।
जस्टिस गोयल ने कहा कि अब तक की जांच से प्रथम दृष्टया स्पष्ट है कि आरोपियों द्वारा इस्तेमाल किए गए नियुक्ति पत्र फर्जी और मनगढ़ंत थे तथा संबंधित सरकारी विभागों में ऐसी कोई भर्ती प्रक्रिया मौजूद नहीं थी।
अदालत ने कहा कि मामला केवल साधारण धोखाधड़ी का नहीं बल्कि एक सुनियोजित साजिश का प्रतीत होता है, जिसमें सभी याचिकाकर्ताओं की सक्रिय भूमिका सामने आती है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि फर्जी सरकारी दस्तावेजों और नौकरी के झूठे आश्वासनों के जरिए बेरोजगार युवाओं का शोषण समाज पर व्यापक असर डालता है।
इसी आधार पर अदालत ने याचिका खारिज की।

