मोटर दुर्घटना मुआवजे की गणना में फैमिली पेंशन की कटौती नहीं हो सकती: पंजाब-हरियाणा हाइकोर्ट
Amir Ahmad
9 Feb 2026 1:00 PM IST

पंजाब एंड हरियाणा हाइकोर्ट ने अहम फैसला देते हुए कहा कि मृतक के आश्रितों को मिलने वाली फैमिली पेंशन को मोटर दुर्घटना मुआवजे की गणना के दौरान घटाया नहीं जा सकता।
हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि फैमिली पेंशन का दुर्घटना में हुई मृत्यु से मिलने वाले मुआवजे से कोई संबंध नहीं है और इसे निर्भरता हानि की गणना से बाहर रखा जाना चाहिए।
जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के हेलेन सी. रेबेलो बनाम महाराष्ट्र राज्य सड़क परिवहन निगम मामले का हवाला देते हुए कहा,
“फैमिली पेंशन भी कर्मचारी द्वारा अपनी सेवा शर्तों के तहत अपने परिवार के हित में अर्जित की जाती है, जो उसकी मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारियों को प्राप्त होती है। फैमिली पेंशन और आकस्मिक मृत्यु के कारण दिए जाने वाले मुआवजे के बीच कोई सह-संबंध नहीं है।”
हाइकोर्ट ने दावेदारों की अपील स्वीकार करते हुए 1 मार्च, 2018 के उस अवॉर्ड में संशोधन किया, जिसमें 23 अप्रैल, 2016 को हुई मोटर वाहन दुर्घटना में केहर सिंह की मृत्यु के लिए 3,22,000 का मुआवजा 7 प्रतिशत ब्याज सहित दिया गया।
मृतक के परिजनों ने मोटर वाहन अधिनियम 1988 की धारा 166 के तहत दावा याचिका दाखिल की थी। मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने मुआवजे की गणना करते समय मृतक की पत्नी को मिलने वाली 24,000 प्रतिमाह फैमिली पेंशन को घटा दिया और मृतक की अनुमानित आय 6,000 प्रतिमाह तय की।
मुआवजे की राशि से असंतुष्ट होकर दावेदार हाइकोर्ट पहुंचे। उनकी ओर से दलील दी गई कि फैमिली पेंशन की कटौती कानूनन अस्वीकार्य है और अधिकरण द्वारा आय का निर्धारण मनमाना है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के हेलेन सी. रेबेलो निर्णय पर भरोसा जताया गया।
बीमा कंपनी ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि अधिकरण द्वारा पारित आदेश उचित और न्यायसंगत है।
हाइकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के सरला वर्मा बनाम दिल्ली परिवहन निगम, प्रणय सेठी, हेलेन सी. रेबेलो, लाल देई, विमल कंवर सेबास्टियानी लाकड़ा तथा हालिया हनुमंथराजू बी बनाम एम. अकरम पाशा (2025) जैसे निर्णयों के आलोक में मामले पर विचार किया।
अदालत ने दोहराया कि फैमिली पेंशन मृतक द्वारा वर्षों की सेवा के माध्यम से अर्जित अधिकार है और यह मृत्यु के कारण पर निर्भर नहीं करती। यदि इसकी कटौती की अनुमति दी जाए तो इसका अर्थ होगा कि दुर्घटना के लिए जिम्मेदार व्यक्ति मृतक की सेवा से जुड़े लाभों का फायदा उठा ले, जो मोटर वाहन अधिनियम के उद्देश्य के विपरीत है।
अधिकरण के दृष्टिकोण को कानूनन टिकाऊ न मानते हुए हाइकोर्ट ने मुआवजे का पुनर्मूल्यांकन किया। अदालत ने मृतक की मासिक आय 24,000 मानी और यह देखते हुए कि पुत्र विवाहित तथा आश्रित नहीं था, 50 प्रतिशत राशि व्यक्तिगत खर्च के रूप में घटाई। 7 का गुणक लागू करते हुए और पारंपरिक मदों जैसे कंसोर्टियम के तहत राशि बढ़ाकर कुल मुआवजा 11,58,000 निर्धारित किया गया।
इस प्रकार अधिकरण द्वारा दी गई राशि की तुलना में 8,36,000 की वृद्धि की गई। बढ़ी हुई राशि पर दावा याचिका दायर करने की तारीख से अदायगी तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी दिया गया।
हाइकोर्ट ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि वह दो महीने के भीतर बढ़ी हुई मुआवजा राशि ब्याज सहित अधिकरण के समक्ष जमा करे।
साथ ही अधिकरण को यह राशि पहले से तय अनुपात में दावेदारों को वितरित करने के निर्देश भी दिए गए।

