झूठी पहचान बताने वाली महिला की गवाही अविश्वसनीय: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने दुष्कर्म दोषी को बरी किया
Amir Ahmad
2 May 2026 3:52 PM IST

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने 2002 के अपहरण और दुष्कर्म मामले में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को बरी किया।
अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष की पूरी कहानी तब ढह गई जब यह सामने आया कि शिकायतकर्ता महिला ने अपनी वास्तविक पहचान छिपाकर एक मृत महिला का नाम अपनाया था और अदालत के समक्ष झूठी जानकारी दी थी।
जस्टिस शालिनी सिंह नागपाल ने कहा कि जिस महिला ने अपनी पहचान के बारे में झूठ बोला हो, उसकी गवाही को बिना परीक्षण के स्वीकार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने टिप्पणी की कि “धोखाधड़ी और न्याय साथ-साथ नहीं चल सकते” और धोखे से अदालत की कार्यवाही को प्रभावित करने का प्रयास न्याय प्रक्रिया को दूषित करता है।
मामले में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 366 (अपहरण), 376 (दुष्कर्म) और 342 (ग़लत तरीके से बंधक बनाना) के तहत दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। यह दोषसिद्धि मुख्यतः शिकायतकर्ता की गवाही पर आधारित थी।
अभियोजन के अनुसार, महिला ने आरोप लगाया कि नवंबर 2002 में उसका जबरन अपहरण कर कई स्थानों पर ले जाया गया और कई दिनों तक उसके साथ दुष्कर्म किया गया।
हालांकि हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन शिकायतकर्ता की पहचान ही साबित नहीं कर सका। अदालत के समक्ष दस्तावेजी साक्ष्य, जिनमें मृत्यु प्रमाणपत्र भी शामिल था, से स्पष्ट हुआ कि जिस महिला के नाम से शिकायतकर्ता स्वयं को प्रस्तुत कर रही थी, उस नाम की वास्तविक महिला की मृत्यु वर्ष 1990 में हो चुकी थी।
रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि संबंधित व्यक्ति ने बाद में पुनर्विवाह किया और उसकी दूसरी पत्नी जीवित थी।
अदालत ने कहा कि इससे स्पष्ट है कि शिकायतकर्ता वह व्यक्ति नहीं है, जिसका दावा वह कर रही थी और उसकी पहचान संबंधी पूरी कहानी झूठी है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता का कथित घटनाक्रम कई दृष्टियों से अविश्वसनीय है। अदालत ने नोट किया कि उसने कथित तौर पर 10 से 12 दिन तक विभिन्न स्थानों की यात्रा की, लेकिन न तो शोर मचाया और न ही भागने का प्रयास किया। मेडिकल साक्ष्य में भी बाहरी चोट के निशान या शुक्राणु नहीं पाए गए।
अदालत ने कहा कि यौन अपराध के मामलों में केवल पीड़िता की गवाही के आधार पर दोषसिद्धि संभव है, लेकिन ऐसी गवाही विश्वसनीय, सुसंगत और भरोसेमंद होनी चाहिए। इस मामले में शिकायतकर्ता उस मानक पर खरी नहीं उतरती।
हाईकोर्ट ने बचाव पक्ष की इस दलील में भी दम पाया कि मामला संभवतः आरोपी के परिवार से जुड़े पूर्व विवादों की प्रतिक्रिया में दर्ज कराया गया।
इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने 23 मार्च 2006 के दोषसिद्धि और सजा आदेश रद्द करते हुए आरोपी को बरी किया।

