भगवद्गीता राज्य को लोककल्याण के कर्तव्य की याद दिलाती है: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने दैनिक वेतनभोगियों के नियमितीकरण का आदेश
Amir Ahmad
5 Jan 2026 6:38 PM IST

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय संवैधानिक व्यवस्था राजधर्म की सभ्यतागत अवधारणा पर आधारित है, जहां शासन का मार्गदर्शन न्याय, निष्पक्षता और करुणा से होना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी कल्याणकारी राज्य कर्मचारियों से वर्षों तक निरंतर सेवा लेकर उन्हें स्थायी असुरक्षा में नहीं रख सकता।
जस्टिस संदीप मौदगिल ने भगवद्गीता के लोकसंग्रह के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि सार्वजनिक शक्ति का प्रयोग केवल प्रशासनिक सुविधा के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिरता और सामूहिक कल्याण के लिए होना चाहिए। राज्य जब सबसे निचले पायदान पर कार्यरत कर्मचारियों से सेवा लेता है तो उसे यह भी देखना होगा कि वह सेवा किन परिस्थितियों में ली जा रही है।
यह टिप्पणी उन रिट याचिकाओं पर की गई, जिनमें 1994 से लगभग तीन दशकों तक लगातार सेवा देने वाले दैनिक वेतनभोगी जल पंप ऑपरेटरों के नियमितीकरण की मांग की गई। विभिन्न नियमितीकरण नीतियों के बावजूद याचिकाकर्ताओं के मामलों पर विचार नहीं किया गया।
राज्य की इस दलील को कि नियुक्ति स्वीकृत पद पर नहीं है या योग्यता नहीं है, अदालत ने खारिज कर दिया। उमा देवी और एम.एल. केसरी जैसे फैसलों का संतुलन करते हुए कोर्ट ने कहा कि अवैध नियुक्तियां भले नियमित न हों, लेकिन लंबे समय तक निरंतर और स्थायी प्रकृति का कार्य करने वाले कर्मचारियों को नियमितीकरण पर निष्पक्ष विचार का अधिकार है।
अदालत ने यह भी कहा कि राज्य अपनी निष्क्रियता से लाभ नहीं उठा सकता। वर्षों तक काम लेकर यह कहना कि “स्वीकृत पद नहीं हैं”, प्रशासनिक विफलता का स्वीकार है। केवल “दैनिक वेतन” या “संविदा” का लेबल बदलकर स्थायी काम कराना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है।
अंततः हाईकोर्ट ने नियमितीकरण से इनकार करने का आदेश रद्द करते हुए राज्य को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को उस नीति के तहत नियमित किया जाए, जिसके अंतर्गत वे पहली बार पात्र हुए, जिसमें 1993, 1996, 2003 और 2011 की नीतियां शामिल हैं।

