21 साल बाद बलात्कार के दोषी को हाईकोर्ट ने किया बरी, गवाही में विरोधाभास और सबूतों की कमी बनी वजह

Amir Ahmad

23 April 2026 5:53 PM IST

  • 21 साल बाद बलात्कार के दोषी को हाईकोर्ट ने किया बरी, गवाही में विरोधाभास और सबूतों की कमी बनी वजह

    पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने वर्ष 2005 में बलात्कार के मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति को बरी किया। अदालत ने कहा कि पीड़िता के बयानों में गंभीर विरोधाभास, ठोस साक्ष्यों का अभाव और फोरेंसिक रिपोर्ट में असंगतियों के कारण दोषसिद्धि को बरकरार रखना सुरक्षित नहीं है। गौरतलब है कि अपील लंबित रहने के दौरान आरोपी की मृत्यु हो चुकी थी।

    जस्टिस रुपिंदरजीत चहल ने अपने फैसले में कहा कि पीड़िता ने अलग-अलग चरणों पर घटना के बारे में भिन्न-भिन्न बयान दिए। उन्होंने पुलिस के समक्ष दिए गए बयान, दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज बयान और अदालत में दी गई गवाही के बीच स्पष्ट अंतर को रेखांकित किया।

    अदालत ने टिप्पणी की,

    “रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि पीड़िता ने विभिन्न चरणों पर घटना के अलग-अलग संस्करण प्रस्तुत किए, जिससे अभियोजन की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।”

    अदालत ने यह भी पाया कि प्रारंभिक बयानों में जहां पीड़िता ने कई बार दुष्कर्म का आरोप लगाया, वहीं अदालत में गवाही देते समय उसने केवल एक घटना का ही उल्लेख किया और पहले के आरोपों का जिक्र नहीं किया। इसे अदालत ने मामले की जड़ को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण बदलाव माना।

    फैसले में अन्य महत्वपूर्ण पहलू आर्थिक विवाद का भी रहा।

    जस्टिस चहल ने कहा कि पीड़िता ने स्वयं मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए बयान में आरोपी के साथ धन संबंधी विवाद का उल्लेख किया था।

    अदालत ने कहा,

    “ऐसी स्वीकारोक्ति झूठे फंसाने की संभावित वजह को जन्म देती है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।”

    फोरेंसिक और मेडिकल साक्ष्यों पर भी अदालत ने गंभीर सवाल उठाए। रिपोर्ट के अनुसार पीड़िता के शरीर से लिए गए नमूनों में वीर्य नहीं पाया गया जबकि एक कपड़े पर वीर्य के निशान मिले जिसे पीड़िता ने घटना के बाद पहनने से इनकार किया। इसके अलावा DNA जांच भी नहीं कराई गई जिससे आरोपी से संबंध स्थापित नहीं हो सका।

    अदालत ने यह भी नोट किया कि एक महत्वपूर्ण गवाह, जो सुरक्षा पर्यवेक्षक था, अपने बयान से मुकर गया। साथ ही, न तो पीड़िता के रोजगार का स्पष्ट प्रमाण प्रस्तुत किया गया और न ही उस स्थान के स्वामित्व या कब्जे को लेकर ठोस साक्ष्य दिए गए, जहां घटना होने का दावा किया गया।

    इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है। ऐसी स्थिति में दोषसिद्धि को बनाए रखना पूर्णतः असुरक्षित होगा। इसी आधार पर अदालत ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।

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