PCPNDT Act में रिकॉर्ड रखने में लापरवाही गंभीर अपराध, इसे मामूली गलती नहीं माना जा सकता: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट

Amir Ahmad

16 May 2026 12:32 PM IST

  • PCPNDT Act में रिकॉर्ड रखने में लापरवाही गंभीर अपराध, इसे मामूली गलती नहीं माना जा सकता: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट

    पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने बरनाला की क्लीनिक संचालिका की सजा बरकरार रखते हुए कहा कि PCPNDT Act के तहत अनिवार्य रिकॉर्ड, विशेषकर फॉर्म एफ का सही रखरखाव नहीं करना गंभीर कानूनी उल्लंघन है और इसे केवल तकनीकी या प्रक्रियात्मक चूक नहीं माना जा सकता।

    जस्टिस रमेश चंदर दिमरी ने 80 वर्षीय डॉ. पुष्प लता मित्तल की याचिका खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराया।

    डॉ. मित्तल को गर्भाधान पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम, 1994 की धारा 29 के उल्लंघन का दोषी ठहराया गया, जिसके लिए धारा 23 के तहत सजा का प्रावधान है।

    हाईकोर्ट ने कहा कि यह कानून कन्या भ्रूण हत्या रोकने और बालिका के जीवन के अधिकार की रक्षा के उद्देश्य से बनाया गया सामाजिक कल्याण कानून है। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड का सही रखरखाव इस कानून के उद्देश्य की मूल शर्त है और इसमें कमी पाए जाने पर दंडात्मक कार्रवाई होना स्वाभाविक है।

    याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि क्लीनिक की जांच और तलाशी प्रक्रिया में खामियां थीं इसलिए बरामद दस्तावेजों पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

    हालांकि अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि यदि तलाशी प्रक्रिया में कोई अनियमितता भी हो तब भी प्रासंगिक और स्वीकार्य साक्ष्यों को केवल इसी आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।

    अदालत ने पाया कि क्लीनिक से बरामद कई फॉर्म एफ में संबंधित डॉक्टर के हस्ताक्षर नहीं थे, जो कानून के स्पष्ट उल्लंघन को दर्शाता है।

    हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने इस बात से इनकार नहीं किया कि रिकॉर्ड उसके क्लीनिक से बरामद हुए। रिकॉर्ड से स्पष्ट रूप से यह साबित होता है कि कानून और 1996 के नियमों का पालन नहीं किया गया।

    अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि पुनर्विचार अधिकार क्षेत्र सीमित होता है और उसमें साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन नहीं किया जा सकता जब तक कि स्पष्ट कानूनी त्रुटि या न्याय में विफलता न दिखे।

    80 वर्ष से अधिक उम्र होने के आधार पर सजा में नरमी की मांग भी अदालत ने ठुकरा दी। हाईकोर्ट ने कहा कि PCPNDT Act के तहत इस प्रकार के उल्लंघन इतने गंभीर हैं कि केवल उम्र के आधार पर सजा कम नहीं की जा सकती।

    इन्हीं टिप्पणियों के साथ अदालत ने एक वर्ष के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा बरकरार रखी।

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