SC/ST Act के प्रावधानों को केवल गैर-समुदाय लोगों के विरुद्ध लागू किया जा सकता है: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट

  • SC/ST Act के प्रावधानों को केवल गैर-समुदाय लोगों के विरुद्ध लागू किया जा सकता है: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट

    अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, (SC/ST Act) के तहत अग्रिम जमानत की अनुमति देते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अधिनियम को केवल उन लोगों के विरुद्ध लागू किया जा सकता है, जो अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम समुदाय से संबंधित नहीं हैं

    जस्टिस मनीषा बत्रा ने कहा,

    "अपीलकर्ता अवतार सिंह और जगसीर सिंह स्वयं अनुसूचित जाति समुदाय के सदस्य बताए गए। इसलिए एक्ट 1989 के प्रावधानों को आकर्षित करने वाला कोई भी प्रथम दृष्टया मामला उनके विरुद्ध नहीं बनता है, क्योंकि अधिनियम, 1989 के प्रावधानों को केवल उन लोगों के विरुद्ध लागू किया जा सकता है, जो अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति समुदाय से संबंधित नहीं हैं।"

    न्यायालय SC/ST Act की धारा 14-ए के तहत एक अपील पर सुनवाई कर रहा था, जिसके तहत एडिशनल सेशन जज के आदेश के खिलाफ BNSS की धारा 482 के तहत उनके द्वारा दायर आवेदनों को BNSS की धारा 126(2), 115(2), 191(3), 190, 324(4), 324(5) और SC/ST Act की धारा 3 के तहत FIR से उत्पन्न मामले में अग्रिम जमानत देने के लिए आवेदनों को खारिज कर दिया गया।

    यह आरोप लगाया गया कि अपीलकर्ताओं ने शिकायतकर्ता के खिलाफ उसकी जाति के संबंध में अपमानजनक टिप्पणी की और पुरुषों के एक समूह पर लाठी से हमला किया।

    अपीलकर्ताओं के सीनियर वकील ने तर्क दिया कि FIR की सामग्री का अध्ययन करने से पता चलता है कि अपीलकर्ताओं में से किसी को भी कोई चोट नहीं लगी है।

    प्रस्तुतियां सुनने के बाद न्यायालय ने पाया कि FIR के अवलोकन से पता चलता है कि यद्यपि अपीलकर्ताओं का नाम FIR में दर्ज है लेकिन उन्हें किसी भी तरह की चोट नहीं पहुंचाई गई।

    जस्टिस बत्रा ने इस बात पर प्रकाश डाला,

    “FIR की सामग्री वर्तमान अपीलकर्ताओं के खिलाफ किसी भी आरोप का खुलासा नहीं करती कि उन्होंने शिकायतकर्ता के खिलाफ कोई अपमानजनक जाति-संबंधी टिप्पणी की थी।”

    शजन स्कारिया बनाम केरल राज्य और अन्य पर भरोसा करते हुए इस बात को रेखांकित किया गया कि न्यायालय पर यह कर्तव्य है कि वह प्रथम दृष्टया अस्तित्व का निर्धारण करे, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि अभियुक्त को कोई अनावश्यक अपमान न पहुंचाया जाए।

    न्यायालय ने कहा था,

    "अदालतों को यह निर्धारित करने के लिए प्रारंभिक जांच करने से नहीं कतराना चाहिए कि शिकायत/FIR में तथ्यों का वर्णन वास्तव में SC/ST Act के तहत अपराध का गठन करने के लिए आवश्यक आवश्यक तत्वों का खुलासा करता है या नहीं।"

    न्यायाधीश ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा था,

    "यह भी देखा गया कि यदि आरोप प्रथम दृष्टया अपराध के आवश्यक तत्वों का खुलासा नहीं करता है तो इसे SC/ST Act की धारा 18 द्वारा परिकल्पित प्रतिबंध को लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं कहा जा सकता है। अन्यथा मानने का मतलब यह होगा कि अपराध के लिए आवश्यक तत्वों से रहित एक सादा आरोप भी उक्त एक्ट की धारा 18 के तहत प्रतिबंध लगाने के लिए पर्याप्त होगा।"

    उपर्युक्त के आलोक में न्यायालय ने याचिका स्वीकार की और कुछ शर्तों के अनुपालन के अधीन अग्रिम जमानत की रियायत दी।

    केस टाइटल: अवतार सिंह और अन्य बनाम पंजाब राज्य और अन्य [संबंधित मामलों के साथ]

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