पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: रिटायरमेंट के वर्षों बाद वेतन निर्धारण के पुराने दावे को पेंशन की कमी बताकर पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता
Amir Ahmad
8 Oct 2026 5:55 PM IST

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि यदि किसी रिटायर कर्मचारी की असली शिकायत सेवाकाल के दौरान तय किए गए वेतन से जुड़ी है और पेंशन में कमी केवल उसका परिणाम है, तो यह गलती सेवानिवृत्ति के साथ ही पूरी हो जाती है। इसे वर्षों बाद "पेंशन में लगातार जारी कमी" बताकर दोबारा नहीं उठाया जा सकता।
जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने याचिका को खारिज करते हुए कहा,
"जो कर्मचारी अपनी नौकरी के दौरान अपने वेतन की सटीकता पर सवाल उठाने से बचता रहा, वह रिटायरमेंट के वर्षों बाद एक मृत दावे को यह कहकर पुनर्जीवित नहीं कर सकता कि उसकी पेंशन में लगातार कमी आ रही है।"
यह फैसला एक सरकारी सहायता प्राप्त कॉलेज के रिटायर लैब अटेंडेंट की याचिका पर सुनाया गया। इसके साथ ही अदालत ने सेवा मामलों में देरी और लापरवाही के लागू होने को लेकर तीन श्रेणियों का एक स्पष्ट ढांचा भी तय किया।
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि अदालतों को शिकायत के शीर्षक पर नहीं, बल्कि उसकी मूल भावना पर गौर करना चाहिए।
क्या था मामला
याचिकाकर्ता ने हरियाणा के एक सरकारी सहायता प्राप्त कॉलेज में 1971 में चपरासी के रूप में नौकरी शुरू की थी। बाद में उन्हें लैब अटेंडेंट के पद पर पदोन्नत किया गया और वे 31 मई 2013 को रिटायर हुए। उनका पेंशन आदेश दिसंबर 2013 में जारी किया गया।
उन्होंने 1 जनवरी 1986 से मैट्रिकुलेट लैब अटेंडेंट को मिलने वाले 950-1500 रुपये के वेतनमान के आधार पर अपने वेतन और परिणामी पेंशन के पुनरुद्धार की मांग की थी। उन्होंने इसके लिए कई पुराने फैसलों और अधिनियमों का हवाला दिया।
दूसरी ओर, राज्य सरकार का तर्क था कि याची 2013 में सेवानिवृत्त हो चुके हैं और वे इसे पेंशन विवाद बताकर इतने वर्षों बाद वेतन निर्धारण का विवाद नहीं उठा सकते।
अदालत द्वारा तय की गई सेवा विवादों की तीन श्रेणियां
पहली श्रेणी में वे दावे शामिल हैं, जिन्हें आमतौर पर देरी के कारण खारिज किया जाता है, जब तक कि देरी का संतोषजनक कारण न बताया जाए। इसमें बर्खास्तगी, चयन न होने या एक बार की गई कार्रवाई से जुड़ी शिकायतें शामिल हैं। इसके अलावा इसमें वरिष्ठता या पदोन्नति के दावे और ऐसे रिटायर कर्मचारी शामिल हैं, जिनकी असली शिकायत सेवाकाल के दौरान तय वेतन से जुड़ी है और पेंशन की कमी उसका केवल नतीजा है।
दूसरी श्रेणी में लगातार होने वाली गलतियां शामिल हैं, जहां देरी के बावजूद दावे पर विचार किया जा सकता है, लेकिन एरियर आमतौर पर याचिका दायर करने से पिछले तीन वर्षों तक सीमित होता है। इसमें सेवाकाल के दौरान गलत वेतन निर्धारण और सीधे तौर पर पेंशन के हक में हुई गलती के मामले शामिल हैं।
तीसरी श्रेणी में वे दावे शामिल हैं, जिनमें एरियर हकदार बनने की तिथि से ही देय होते हैं, जैसे कि किसी विधवा द्वारा मांगी जाने वाली पारिवारिक पेंशन और सशस्त्र बलों के सदस्यों को मिलने वाली विकलांगता पेंशन।
याचिका पहली श्रेणी में हुई खारिज
अदालत ने पाया कि याची की पेंशन में सुधार की मांग पूरी तरह से 1986 से उच्च वेतनमान दिए जाने पर निर्भर थी, इसलिए उनकी असली शिकायत सेवाकाल के दौरान मिले वेतन से थी। चूंकि वह मई 2013 में रिटायर हुए और उन्होंने एक दशक बाद याचिका दायर की, इसलिए उनका मामला पहली श्रेणी में आता है।
अदालत ने कहा कि बार-बार अभ्यावेदन देने से मृत दावा जीवित नहीं रहता।
इसे देखते हुए हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की।

