फर्जी जमानत आदेश बनाकर ₹10 लाख से अधिक की ठगी का मामला: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने वकील को अग्रिम जमानत देने से किया इनकार

Amir Ahmad

24 Jun 2026 12:47 PM IST

  • फर्जी जमानत आदेश बनाकर ₹10 लाख से अधिक की ठगी का मामला: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने वकील को अग्रिम जमानत देने से किया इनकार

    पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने फर्जी जमानत आदेश तैयार कर शिकायतकर्ताओं से 10 लाख रुपये से अधिक की कथित ठगी करने के आरोपी एक वकील की अग्रिम जमानत याचिका खारिज की।

    अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि केवल वकील होना अग्रिम जमानत दिए जाने का आधार नहीं हो सकता।

    जस्टिस दीपक गुप्ता ने कहा,

    "सिर्फ इसलिए कि याचिकाकर्ता एक प्रैक्टिस करने वाले वकील है, उसे अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती। किसी व्यक्ति का पेशा उसे कानून से ऊपर नहीं रखता और न ही अग्रिम जमानत पर विचार के लिए अलग मानक तय करता है।"

    अदालत ने कहा कि अग्रिम जमानत पर फैसला करते समय आरोपों की प्रकृति और गंभीरता, आरोपी की भूमिका, हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता तथा जांच पर उसके प्रभाव जैसे स्थापित कानूनी मानकों को ही देखा जाता है।

    मामला 13 मई 2026 को चंडीगढ़ के सेक्टर-39 थाने में दर्ज FIR से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार शिकायतकर्ताओं ने जेल में बंद अपने रिश्तेदार की जमानत कराने के लिए आरोपी वकील से संपर्क किया।

    आरोप है कि वकील ने खुद को न्यायिक अधिकारियों से प्रभावशाली संबंध रखने वाला बताते हुए जमानत दिलाने का भरोसा दिया और इसी बहाने बैंक हस्तांतरण तथा नकद के माध्यम से करीब 10.92 लाख रुपये ले लिए।

    शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि बाद में वकील ने उन्हें हाईकोर्ट का कथित जमानत आदेश भी दिखाया, जो संदिग्ध था और उस पर कोई आधिकारिक मुहर नहीं थी। जांच में पता चला कि ऐसी कोई जमानत याचिका कभी दाखिल ही नहीं की गई।

    वकील की ओर से दलील दी गई कि वह विधिवत पंजीकृत वकील है और शिकायतकर्ताओं की ओर से पेशेवर रूप से नियुक्त किया गया। उसके अनुसार विवाद केवल पेशेवर फीस से जुड़ा दीवानी मामला है, जिसे आपराधिक रंग दे दिया गया।

    हालांकि, राज्य सरकार ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि बैंक रिकॉर्ड समेत दस्तावेजी और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य आरोपों का समर्थन करते हैं। यह भी बताया गया कि शिकायतकर्ताओं ने रकम जुटाने के लिए कर्ज लिया और संपत्ति तक गिरवी रखी थी।

    राज्य ने अदालत को यह भी बताया कि आरोपी गिरफ्तारी से बच रहा है और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस की फोरेंसिक जांच जारी है, जिसके लिए हिरासत में पूछताछ आवश्यक है।

    हाईकोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया रिकॉर्ड से 10.92 लाख रुपये प्राप्त होने के संकेत मिलते हैं और मामला केवल फीस विवाद तक सीमित नहीं है। आरोपों में लोगों को झांसा देना और सरकारी अधिकारियों पर प्रभाव होने का दावा करना भी शामिल है।

    अदालत ने विशेष रूप से फर्जी न्यायिक आदेश तैयार करने के आरोप को गंभीर बताते हुए कहा कि ऐसे कृत्य न्याय व्यवस्था की नींव पर सीधा प्रहार करते हैं और उनकी गहन जांच जरूरी है।

    फोरेंसिक जांच लंबित होने, आरोपी के कथित रूप से गिरफ्तारी से बचने और हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अग्रिम जमानत देने का कोई आधार नहीं बनता।

    इन्हीं कारणों से अदालत ने आरोपी वकील की अग्रिम जमानत याचिका खारिज की।

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