बिना पैरोल पूरी उम्र जेल की सजा पाने वाले दोषी को अस्थायी रिहाई मांगने से पहले सजा की शर्त में बदलाव कराना होगा: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट
Amir Ahmad
26 Oct 2026 3:54 PM IST

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने ऐसे दोषी को पैरोल देने से इनकार किया, जिसे बिना पैरोल के अपने प्राकृतिक जीवन के शेष समय तक जेल में रहने की सजा सुनाई गई। कोर्ट ने कहा कि जब तक सजा के आदेश में दर्ज यह शर्त बरकरार है तब तक पैरोल देना ट्रायल कोर्ट के फैसले के विपरीत होगा।
जस्टिस अनूप चितकारा और जस्टिस हरमीत सिंह देओल की खंडपीठ ने दोषी की ओर से दायर याचिका खारिज की। दोषी ने हरियाणा सदाचारी कैदी (अस्थायी रिहाई) अधिनियम, 2022 के तहत आठ सप्ताह की पैरोल देने से जिला मजिस्ट्रेट के इनकार को चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि सजा सुनाते समय स्पष्ट शर्त लगाई गई कि याचिकाकर्ता को बिना पैरोल के अपने प्राकृतिक जीवन के शेष समय तक कारावास में रहना होगा। दोषसिद्धि के खिलाफ उसकी अपील हाईकोर्ट में लंबित है।
खंडपीठ के अनुसार, याचिकाकर्ता को पहले सजा में दर्ज इस शर्त में बदलाव कराना होगा। जब तक 9 जनवरी, 2020 को जींद के एडिशनल सेशंस जज द्वारा पारित आदेश में इस शर्त को बदला या निरस्त नहीं किया जाता, तब तक पैरोल देना ट्रायल कोर्ट के फैसले के पीछे के तर्क को निष्प्रभावी करने जैसा होगा। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि संभवतः जघन्य अपराध में मृत्युदंड के बजाय यह विशेष सजा इसी वजह से दी गई।
खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि पैरोल कोई अधिकार नहीं है और सक्षम प्राधिकारी वैध कारणों के आधार पर इससे इनकार कर सकता है। हालांकि, पैरोल की व्यवस्था का उद्देश्य दोषियों को अपने परिवार और समाज से संबंध बनाए रखने तथा जरूरी व्यक्तिगत और घरेलू जरूरतें पूरी करने का अवसर देना है। अपराध की गंभीरता सजा की शर्तों के निर्धारण में प्रासंगिक है और विशेष परिस्थितियों में पैरोल से इनकार करने का आधार बन सकती है।
याचिकाकर्ता को वर्ष 2017 में दर्ज FIR के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया। मामला भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 364, 302, 201 और 34, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) तथा POCSO Act की धारा 6 के तहत दर्ज किया गया।
9 जनवरी, 2020 को जींद के एडिशनल सेशंस जज ने उसे दोषी ठहराते हुए बिना पैरोल के प्राकृतिक जीवन के शेष समय तक कारावास की सजा सुनाई। इसके साथ उस पर 23,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया। दोषसिद्धि के खिलाफ उसकी अपील हाईकोर्ट में लंबित है।
दोषी ने आठ सप्ताह की पैरोल मांगते हुए दलील दी थी कि उसकी मां का काफी समय पहले निधन हो चुका है, उसके पिता एक अन्य FIR के मामले में हिरासत में हैं और उसकी बहन संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा की तैयारी कर रही है। उसने कहा कि परिवार में कोई अन्य सदस्य नहीं है जो उसकी बहन की देखभाल कर सके।
हालांकि, जिला मजिस्ट्रेट ने उसकी अर्जी खारिज की। इसके पीछे मुख्य कारण यह बताया गया कि अस्थायी रिहाई सजा की शर्त और समाज के हितों के अनुरूप नहीं होगी। आदेश में यह भी दर्ज किया गया कि सितंबर 2025 में जेल के कैदी कॉलिंग सिस्टम का दुरुपयोग करने के लिए याचिकाकर्ता को दंडित किया गया। उसने दूसरे विचाराधीन कैदी को कॉन्फ्रेंस कॉल की थी।
हाईकोर्ट ने पैरोल से संबंधित स्थापित कानूनी सिद्धांतों की समीक्षा की और सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों पर भरोसा किया। इनमें सुनील फुलचंद शाह बनाम भारत संघ, पूनम लता बनाम एम.एल. वाधवान, मारू राम बनाम भारत संघ और गृह सचिव (कारागार) बनाम एच. निलोफर निशा के फैसले शामिल थे।
इन फैसलों के आधार पर हाईकोर्ट ने कहा कि पैरोल सशर्त और अस्थायी रिहाई है, न कि कोई पूर्ण अधिकार। इसे मंजूर करने की शक्ति मुख्य रूप से प्रशासनिक प्राधिकारी के पास होती है और न्यायिक हस्तक्षेप असाधारण परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए। ऐसा हस्तक्षेप तब उचित हो सकता है, जब पैरोल की मांग को बिना उचित कारण खारिज किया गया हो, महत्वपूर्ण परिस्थितियों की अनदेखी की गई हो या निर्णय ऐसे आधारों पर लिया गया हो जिनका सार्वजनिक व्यवस्था, राज्य की सुरक्षा अथवा रिहाई के दुरुपयोग की आशंका से तार्किक संबंध न हो।
खंडपीठ ने स्वामी श्रद्धानंद बनाम कर्नाटक राज्य मामले का भी उल्लेख किया। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युदंड के विकल्प के रूप में एक विशेष प्रकार की सजा को मान्यता दी थी, जिसमें दोषी को निर्देश दिया जाता है कि उसे जीवनभर रिहा नहीं किया जाएगा। हाईकोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में ट्रायल कोर्ट ने बिना पैरोल की शर्त इसी सिद्धांत के तहत लगाई, जिसका उद्देश्य मृत्युदंड का इस्तेमाल यथासंभव सीमित रखना है।
हाईकोर्ट ने हरियाणा सदाचारी कैदी (अस्थायी रिहाई) अधिनियम, 2022 के तहत नियमित पैरोल, आपातकालीन पैरोल, हिरासत के दौरान पैरोल और गंभीर श्रेणी के दोषियों से संबंधित प्रावधानों पर भी विचार किया। कोर्ट ने दोहराया कि पैरोल कैदियों को पारिवारिक और सामाजिक संबंध बनाए रखने तथा जरूरी घरेलू जरूरतें पूरी करने में मदद करती है, लेकिन अपराध की गंभीरता और मामले की विशिष्ट परिस्थितियां इसके इनकार को उचित ठहरा सकती हैं।
मौजूदा मामले में खंडपीठ ने कहा कि अपनी बहन की देखभाल करने की याचिकाकर्ता की जरूरत सजा के मौजूदा आदेश में स्पष्ट रूप से दर्ज शर्त को निष्प्रभावी नहीं करती। न ही इससे ऐसी आपात स्थिति साबित होती है, जिसके लिए कानून के तहत अस्थायी रिहाई पर विचार किया जा सके।
हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की, लेकिन याचिकाकर्ता के लिए दो विकल्प खुले रखे। यदि भविष्य में वास्तव में कोई अत्यावश्यक परिस्थिति पैदा होती है, तो वह सक्षम प्राधिकारी के समक्ष नए सिरे से आवेदन कर सकता है। इसके अलावा, वह सजा में दर्ज बिना पैरोल वाली शर्त में बदलाव कराने या उसे निरस्त करने के लिए भी उचित कानूनी उपाय अपना सकता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके आदेश में दोषसिद्धि के खिलाफ लंबित आपराधिक अपील के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की गई।

