76 साल के बीमार आरोपी को जमानत देते हुए हाईकोर्ट बोला- न्याय के लिए जज में रीढ़ की हड्डी होनी चाहिए

Amir Ahmad

14 Sept 2026 12:28 PM IST

  • 76 साल के बीमार आरोपी को जमानत देते हुए हाईकोर्ट बोला- न्याय के लिए जज में रीढ़ की हड्डी होनी चाहिए

    पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में 76 वर्षीय आरोपी को खराब स्वास्थ्य और पांच साल से अधिक समय से जेल में रहने के आधार पर अंतरिम जमानत दी। हाईकोर्ट ने कहा कि 75 वर्ष से अधिक उम्र के किसी बीमार व्यक्ति की जमानत याचिका पर फैसला करते समय अदालत को उसकी उम्र और स्वास्थ्य को बेहद संवेदनशीलता के साथ देखना चाहिए। ऐसी याचिका खारिज करने से पहले जज को इसके कारण भी स्पष्ट रूप से दर्ज करने चाहिए।

    जस्टिस अनूप चितकारा और जस्टिस हरमीत सिंह देओल की पीठ ने कहा कि अस्वस्थ वृद्धावस्था एक अभिशाप है। अदालत ने कहा कि ऐसे बुजुर्ग या गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति को जेल की चारदीवारी के भीतर इलाज के लिए मजबूर करना अमानवीय हो सकता है, जिसे बाहर बेहतर मेडिकल सुविधा मिल सकती है।

    पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए जस्टिस चितकारा ने कहा,

    “75 वर्ष से अधिक उम्र का कोई व्यक्ति स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के साथ हिरासत में है तो संबंधित जज में न्याय करने का साहस होना चाहिए और उम्र तथा स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर पूरी सहानुभूति और चिंता के साथ विचार करना चाहिए।”

    अदालत ने यह टिप्पणी उस आरोपी की दूसरी जमानत याचिका पर की, जिसमें उसके वकील ने मामले के गुण-दोष पर कोई दलील नहीं दी और केवल खराब स्वास्थ्य तथा लंबे समय से जारी हिरासत के आधार पर अंतरिम जमानत मांगी।

    आरोपी की उम्र 76 वर्ष है और वह गंभीर बीमारियों से जूझ रहा है। उसके वकील ने अदालत को बताया कि उसकी रीढ़ की हड्डी की बड़ी सर्जरी हो चुकी है और उसे लगातार विशेषज्ञ चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता है, जो जेल में उपलब्ध कराना मुश्किल है। यह भी कहा गया कि आरोपी के खिलाफ मामले से जुड़े दस्तावेज पहले ही प्रवर्तन निदेशालय के कब्जे में हैं, इसलिए उसके फरार होने की आशंका नहीं है।

    प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने जमानत का विरोध करते हुए आरोप लगाया कि आरोपी वर्ष 2016 से समन से बचता रहा और गिरफ्तारी से पहले फरार था। एजेंसी ने यह भी आरोप लगाया कि उसने फरार बेटे के नाम का इस्तेमाल कर संपत्तियां खरीदीं। इसके अलावा उसके खिलाफ दो अन्य मामलों में दोषसिद्धि और कारावास की सजा का भी हवाला दिया गया।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह मामले के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दे रहा है। अदालत ने कहा कि इस स्तर पर उसका विचार केवल आरोपी की मेडिकल स्थिति और लंबे समय से चली आ रही हिरासत तक सीमित है।

    मामला धन शोधन निवारण अधिनियम के तहत दर्ज उस प्रवर्तन मामले से जुड़ा है, जिसकी पृष्ठभूमि में मादक पदार्थों की तस्करी का मामला है। आरोप है कि 925 किलोग्राम केटामाइन चीन और एक टन स्यूडोएफेड्रिन कनाडा भेजने की तस्करी की गई थी। इसके अलावा 10 किलोग्राम स्यूडोएफेड्रिन और 500 ग्राम नशीला पाउडर बरामद होने का भी आरोप है।

    हाईकोर्ट ने मेडिकल आधार पर जमानत से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का उल्लेख किया। इनमें तुलसी राम यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, शोमा कांति सेन बनाम महाराष्ट्र राज्य, संकेत बालुभाई पटेल बनाम राजस्व खुफिया निदेशालय और शेख जावेद इकबाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसले शामिल हैं। अदालत ने कहा कि उम्र, गंभीर बीमारी और लंबे समय तक चलने वाली हिरासत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

    धन शोधन निवारण अधिनियम की धारा 45 में जमानत के लिए कड़े प्रावधान हैं। हाईकोर्ट ने माना कि सामान्य तौर पर इन शर्तों का पालन जरूरी है, लेकिन कानून का प्रावधान बीमार और कमजोर व्यक्तियों के लिए अपवाद भी रखता है।

    अदालत ने कहा,

    “यदि कोई व्यक्ति मेडिकल रूप से इतना अस्वस्थ है कि जेल की बंद दीवारों के भीतर उसका इलाज केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है तो धारा 45 की कठोरता जमानत में बाधा नहीं बन सकती।”

    कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार से भी जोड़ा।

    लंबी हिरासत के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी वर्तमान मामले में पांच साल से अधिक समय जेल में बिता चुका है। मुकदमे के लंबे समय तक समाप्त नहीं होने की स्थिति में केवल इस आधार पर किसी व्यक्ति को अनिश्चितकाल तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता कि प्रवर्तन निदेशालय धन की वसूली नहीं कर पाया या कानून में मौजूद किसी कमी के कारण मुकदमा आगे नहीं बढ़ सका।

    इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने आरोपी को 11 सितंबर 2026 से 21 दिसंबर 2026 तक अंतरिम जमानत दी। उसे निचली अदालत की संतुष्टि के अनुसार एक लाख रुपये का जमानत बांड और इतनी ही राशि का एक जमानती पेश करना होगा। स्वास्थ्य में सुधार नहीं होने पर उसे जमानत अवधि बढ़ाने के लिए अदालत का रुख करने की स्वतंत्रता भी दी गई।

    हाईकोर्ट ने साफ किया कि यह आदेश किसी अन्य मामले के लिए सामान्य मिसाल नहीं माना जाएगा। इसका मामले के गुण-दोष या किसी सह-आरोपी के मामले पर भी कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

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