फोन पर दी गई जातिसूचक गालियां SC/ST Act के तहत अपराध नहीं, यदि घटना 'सार्वजनिक दृश्य' में न हो: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट

Amir Ahmad

30 July 2026 12:11 PM IST

  • फोन पर दी गई जातिसूचक गालियां SC/ST Act के तहत अपराध नहीं, यदि घटना सार्वजनिक दृश्य में न हो: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट

    पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति ने फोन पर कथित रूप से जातिसूचक गालियां दी हैं, तो मात्र इस आधार पर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) की धाराएं लागू नहीं होंगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि इन धाराओं के तहत अपराध तभी बनता है, जब कथित घटना पब्लिक व्यू में घटित हुई हो।

    जस्टिस आलोक जैन ने ट्रायल कोर्ट का वह आदेश बरकरार रखा, जिसमें आरोपी को SC/ST Act की धारा 3(1)(र) और 3(1)(स) के आरोपों से आरोपमुक्त कर दिया गया।

    मामले में याचिकाकर्ता ज्योति देवी ने आरोप लगाया कि आरोपी ने उनके नाबालिग बेटे से फोन पर बात करते समय जातिसूचक गालियां दीं और धमकियां दीं।

    ट्रायल कोर्ट ने माना था कि SC/ST Act की उक्त धाराओं के आवश्यक तत्व इस मामले में मौजूद नहीं हैं। इसलिए मामला सामान्य आपराधिक कानून के तहत सुनवाई के लिए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत भेज दिया गया। इस आदेश को याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

    याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि आरोपी सार्वजनिक स्थान पर बैठकर फोन पर बात कर रहा था और वहां मौजूद अन्य लोग भी बातचीत सुन सकते थे। इसलिए घटना को 'सार्वजनिक दृश्य' में हुई माना जाना चाहिए।

    हाईकोर्ट ने SC/ST Act की संबंधित धाराओं और सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि इन प्रावधानों के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए यह आवश्यक है कि कथित जातिसूचक अपमान या धमकी सार्वजनिक दृश्य में दी गई हो।

    अदालत ने पाया कि FIR के अनुसार कथित जातिसूचक गालियां फोन पर याचिकाकर्ता के बेटे को दी गई थीं। स्वयं शिकायतकर्ता उस बातचीत का हिस्सा नहीं थीं और उन्होंने कथित गालियां प्रत्यक्ष रूप से नहीं सुनीं। उन्हें इस घटना की जानकारी केवल अपने बेटे से मिली।

    हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में यह नहीं माना जा सकता कि कथित घटना 'सार्वजनिक दृश्य' में हुई, जो SC/ST Act की संबंधित धाराओं को लागू करने के लिए आवश्यक शर्त है।

    अदालत ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के स्थापित कानूनी सिद्धांतों का सही पालन किया। इसलिए उसके आदेश में किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि नहीं है।

    इन्हीं कारणों से हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार रखा।

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