पेंशन के लिए पूर्व सेवा की गणना पर कोई टकराव नहीं: पंजाब एंड हरियाणा हाइकोर्ट की पूर्ण पीठ का स्पष्ट निर्णय

Amir Ahmad

18 Feb 2026 12:55 PM IST

  • पेंशन के लिए पूर्व सेवा की गणना पर कोई टकराव नहीं: पंजाब एंड हरियाणा हाइकोर्ट की पूर्ण पीठ का स्पष्ट निर्णय

    पंजाब एंड हरियाणा हाइकोर्ट की पूर्ण पीठ ने पेंशन संबंधी लाभ के लिए पूर्व सेवा की गणना को लेकर दो खंडपीठ के निर्णयों में कथित विरोधाभास के प्रश्न पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।

    अदालत ने कहा कि दोनों निर्णय अलग-अलग तथ्यात्मक और वैधानिक परिस्थितियों में दिए गए, इसलिए उनमें किसी प्रकार का वास्तविक टकराव नहीं है।

    चीफ जस्टिस शील नागू, जस्टिस विनोद एस. भारद्वाज और जस्टिस जगमोहन बंसल की पीठ ने कहा,

    “किसी भी निर्णयों के बीच कथित टकराव वास्तविक, प्रत्यक्ष और अपूरणीय होना चाहिए, जो समान तथ्यों और समान विधिक व्यवस्था पर आधारित विधि प्रश्न से उत्पन्न हो। केवल परिणाम में अंतर या भिन्न नीतियों के संदर्भ का उल्लेख अपने आप में टकराव नहीं माना जा सकता।”

    मामला उस समय पूर्ण पीठ के समक्ष आया, जब एकल पीठ के समक्ष गुरुदेव व अन्य बनाम हरियाणा राज्य व अन्य याचिका में यह प्रश्न उठा कि क्या दो खंडपीठ के निर्णय हरियाणा राज्य कृषि विपणन बोर्ड बनाम प्रेम प्रकाश गुप्ता (निर्णय दिनांक 05.10.2016) और हरियाणा राज्य बनाम नाथू सिंह (निर्णय दिनांक 29.05.2018) आपस में विरोधाभासी हैं?

    याचिकाकर्ताओं ने प्रेम प्रकाश गुप्ता मामले पर भरोसा करते हुए कहा कि पूर्व सेवा की गणना का लाभ दिया जा चुका है। उस निर्णय के विरुद्ध विशेष अनुमति याचिका भी खारिज हो चुकी है।

    दूसरी ओर राज्य ने नाथू सिंह मामले का हवाला दिया, जिसमें इसी प्रकार का लाभ अस्वीकार किया गया।

    पूर्ण पीठ ने विस्तार से दोनों मामलों का विश्लेषण किया। प्रेम प्रकाश गुप्ता मामले में विवाद 07.01.2002 के वित्त विभाग के ज्ञापन की व्याख्या से संबंधित था, जिसमें सरकारी एवं स्वायत्त संस्थाओं के बीच समायोजन के मामलों में पूर्व सेवा की गणना का प्रावधान था।

    राज्य ने तर्क दिया कि कर्मचारियों ने निर्धारित समय में विकल्प नहीं चुना इसलिए लाभ नहीं मिल सकता।

    खंडपीठ ने यह दलील अस्वीकार करते हुए कहा कि संबंधित कर्मचारी उस समय सेवा में ही नहीं थे, इसलिए विकल्प न देने के आधार पर लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।

    इसके विपरीत नाथू सिंह मामले में कर्मचारी को 21.06.2006 की वैधानिक योजना के तहत पुनर्नियुक्ति मिली, जो संविधान के अनुच्छेद 309 के अंतर्गत बनाई गई।

    इस योजना में स्पष्ट शर्त थी कि पुनर्नियुक्ति को नई नियुक्ति माना जाएगा और पूर्व सेवा का कोई लाभ दावा नहीं किया जाएगा। नियुक्ति पत्र में भी यही शर्त शामिल थी। इसलिए खंडपीठ ने पूर्व सेवा की गणना से इनकार कर दिया।

    पूर्ण पीठ ने पूर्व निर्णय सिद्धांत के आलोक में कहा कि कोई भी फैसला उसी सिद्धांत (रेशियो) तक बाध्यकारी होता है जो वह अपने तथ्यों और लागू विधिक ढांचे के संदर्भ में स्थापित करता है। मामूली तथ्यात्मक अंतर भी अलग परिणाम दे सकता है।

    पीठ ने स्पष्ट किया कि नीतियां और वैधानिक योजनाएं अपने विशेष संदर्भ में लागू होती हैं। यदि दो निर्णय अलग-अलग नीतियों या वैधानिक व्यवस्थाओं की व्याख्या करते हैं तो उन्हें केवल इसलिए विरोधाभासी नहीं कहा जा सकता कि उनका विषय व्यापक रूप से समान है।

    अदालत ने कहा,

    “जब विवादित मुद्दे भिन्न हों और निर्णय अलग-अलग नीतियों, निर्देशों या वैधानिक योजनाओं के आधार पर दिए गए हों तब उन्हें परस्पर विरोधी नहीं माना जा सकता।”

    पूर्ण पीठ ने माना कि दोनों खंडपीठ के समक्ष नीतियां और तथ्यात्मक परिस्थितियां अलग थीं। इसलिए उनमें किसी प्रकार का वास्तविक विधिक टकराव नहीं है।

    अदालत ने कहा कि एकल पीठ द्वारा संदर्भ भेजना इस धारणा पर आधारित था कि दोनों निर्णयों में विरोधाभास है, जबकि वस्तुतः ऐसा नहीं है।

    इस प्रकार पूर्ण पीठ ने स्पष्ट कर दिया कि पूर्व सेवा की गणना संबंधी दोनों निर्णय अपने-अपने संदर्भ में सही हैं और उनमें कोई कानूनी विरोधाभास नहीं पाया जाता।

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