पुलिस की बर्बरता नहीं रुकी तो कानून का राज खत्म हो जाएगा, पुलिस 'नाजी जर्मनी' जैसी बन सकती है: पटना हाईकोर्ट
Amir Ahmad
20 Jun 2026 3:07 PM IST

पटना हाईकोर्ट ने कथित पुलिस हिरासत में यातना के एक गंभीर मामले में सख्त रुख अपनाते हुए बक्सर जिले के मुरार थाने के तत्कालीन थाना प्रभारी के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि यदि पुलिस की ऐसी बर्बरता पर अंकुश नहीं लगाया गया तो कानून का शासन और नागरिकों के जीवन एवं स्वतंत्रता की संवैधानिक सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी, तथा पुलिस का स्वरूप "नाजी जर्मनी" की पुलिस जैसा हो सकता है।
जस्टिस जितेंद्र कुमार की एकल पीठ उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें मुरार थाने के तत्कालीन थाना प्रभारी कमल नयन पांडेय के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की गई।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि उसने थाना प्रभारी, पुलिस अधीक्षक और जिला पदाधिकारी को लिखित शिकायतें दीं, लेकिन इसके बावजूद कोई FIR दर्ज नहीं की गई। याचिका के अनुसार 4 जुलाई 2024 को वह अपने भूमि संबंधी दस्तावेजों को ऑनलाइन अपलोड कराने के लिए चौगाई गांव में अपने एक मित्र की दुकान पर गया। इसी दौरान थाना प्रभारी वहां पहुंचे और पहचान पूछने के बाद कथित रूप से जातिसूचक टिप्पणियां करते हुए डंडे से उसकी पिटाई कर दी, जिससे उसके दोनों पैरों में फ्रैक्चर हो गया।
अदालत के समक्ष एक्स-रे रिपोर्ट पेश की गई, जिसमें दोनों पैरों में फ्रैक्चर की पुष्टि हुई। राज्य सरकार ने भी अपने जवाब में इस तथ्य का खंडन नहीं किया। हालांकि पुलिस का दावा था कि बारिश के कारण फिसलने से याचिकाकर्ता को चोट लगी थी और उसके साथ कोई मारपीट नहीं हुई।
हाईकोर्ट ने पुलिस की इस दलील को स्वीकार करने से इनकार किया।
अदालत ने कहा,
"एक्स-रे रिपोर्ट में दिखाई देने वाली दोनों पैरों की हड्डियां टूटने की स्थिति पुलिस के इस स्पष्टीकरण पर विश्वास करने के लिए प्रेरित नहीं करती। यह मानना भी कठिन है कि एक गरीब व्यक्ति, जो सामान्य नागरिक के खिलाफ FIR दर्ज कराने का साहस नहीं जुटा पाता, वह किसी पुलिस अधिकारी के खिलाफ झूठा आरोप लगाएगा।"
अदालत ने माना कि याचिका में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया गंभीर संज्ञेय अपराध का खुलासा करते हैं। ऐसे मामलों में इस स्तर पर आरोपों की सत्यता की जांच नहीं की जाती, बल्कि यह देखा जाता है कि FIR दर्ज करने योग्य मामला बनता है या नहीं।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोपी पुलिस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई के लिए किसी पूर्व सरकारी अनुमति की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि किसी गरीब व्यक्ति के साथ इस प्रकार की कथित बर्बरता को सरकारी कर्तव्य का हिस्सा नहीं माना जा सकता।
अदालत ने वरिष्ठ अधिकारियों की निष्क्रियता पर भी गंभीर चिंता जताई। हाइकोर्ट ने कहा कि पुलिस अधीक्षक और जिला पदाधिकारी तक शिकायत पहुंचने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की गई।
अदालत ने टिप्पणी की,
"व्यक्ति कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, कानून सबसे ऊपर है। कानून के समक्ष समानता और सभी को समान संरक्षण का अधिकार हर नागरिक को प्राप्त है, चाहे वह कितना भी गरीब क्यों न हो।"
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को मजिस्ट्रेट के समक्ष वैकल्पिक उपाय अपनाने के लिए भेजने से भी इनकार किया। अदालत ने कहा कि इस चरण पर उसे उस प्रक्रिया की ओर भेजना उसके साथ और अधिक अन्याय होगा।
पीठ ने माना कि मामले में संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के उल्लंघन का स्पष्ट आरोप है। अदालत ने कहा कि यदि ऐसे मामलों में FIR दर्ज करने का आदेश नहीं दिया गया तो जनता का विश्वास पुलिस व्यवस्था और संवैधानिक अदालतों दोनों से उठ सकता है।
अदालत ने मुरार थाने के थाना प्रभारी को तत्कालीन थाना प्रभारी कमल नयन पांडेय के खिलाफ FIR दर्ज करने का निर्देश दिया। साथ ही बिहार के पुलिस महानिदेशक को आदेश दिया गया कि मामले की जांच अपराध अनुसंधान विभाग को सौंपी जाए, क्योंकि आरोप एक पुलिस अधिकारी के खिलाफ हैं।
अपने कड़े शब्दों वाले आदेश में हाईकोर्ट ने कहा,
"यदि ऐसे आचरण पर नियंत्रण नहीं किया गया और इसे रोका नहीं गया तो कानून का शासन तथा नागरिकों के जीवन और स्वतंत्रता की संवैधानिक सुरक्षा समाप्त हो जाएगी और राष्ट्रीय पुलिस का स्वरूप नाजी जर्मनी की पुलिस जैसा हो सकता है।"
अदालत ने पुलिस महानिदेशक को 30 दिनों के भीतर अनुपालन रिपोर्ट हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के समक्ष प्रस्तुत करने का भी निर्देश दिया।

